पर्यावरण प्रदूषण (Environmental Pollution)

Paryavaran Pradushan
Paryavaran Pradushan

प्रदूषण

वायु, जल, मिट्टी आदि का अवांछित द्रव्यों से दूषित होना प्रदूषण (Pollution) कहलाता है। प्रदूषण पर्यावरण को और जीव-जंतुओं को नुकसान पहुँचाते हैं। प्रदूषण को दो भागों में विभाजित करते है – पर्यावरण प्रदूषण, पर्यावरण अवनयन।

पर्यावरण प्रदूषण

जब वायु, जल, मिट्टी आदि मानव जनित कारकों से अवांछित द्रव्यों से दूषित होते हैं, तथा उनका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, उसे पर्यावरण प्रदूषण (Environmental Pollution) कहते हैं। मुख्य रूप से पर्यावरण प्रदूषण के 4 भाग होते हैं। जिसमें जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, ये 4 तरह के प्रदूषण के होते हैं।

पर्यावरण अवनयन

जब प्राकृतिक कारकों और मानव जनित कारकों के प्रभाव के परिणाम स्वरुप पर्यावरण में क्षति उत्पन्न होती है तो वह पर्यावरण अवनयन (Environmental degradation) कहलाता है। जिसमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण, भूकंप, ज्वालामुखी, विस्फोट, बाढ़, सुनामी, वनाग्नि और अन्य प्राकृतिक आपदाएं शामिल की जाती हैं।

प्रदूषक

हमारे पर्यावरण के वे तत्त्व जिनसे प्रदूषण उत्पन्न होता है, उन्हें प्रदूषक (Pollutants) कहते हैं। जैसे – कार्बन डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, वाष्पशील हाइड्रोकार्बंस एवं ओजोन आदि।

श्रोत या उत्पत्ति के आधार पर प्रदूषकों को दो भागों में विभाजित किया जाता है:-

1. प्राथमिक प्रदूषक

हमारी प्रकृति के वे तत्त्व जो पर्यावरण में अपने स्वतंत्र प्रभाव से क्षति उत्पन्न करते हैं तथा इन्हें किसी अन्य तत्वों से अभिक्रिया करने की आवश्यकता नहीं होती है, उन्हें प्राथमिक प्रदूषक कहते हैं। जैसे – कार्बन डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, मेथेन, हाइड्रोजन इत्यादि।

2. द्वितीयक प्रदूषक

हमारे पर्यावरण के वे तत्त्व जो किसी अन्य तत्त्व से अभिक्रिया करके पर्यावरण को क्षति पहुंचाते हैं, उन्हें द्वितीयक प्रदूषक कहते हैं। जैसे – कुहरा, अम्ल बर्षा, ओजोन इत्यादि।

निस्तारण के आधार पर भी प्रदूषकों को दो भागों में विभाजित किया जाता है:-

1. अपघटनीय प्रदूषक या जैव निम्नीकरण प्रदूषक

वे प्रदूषक जो अपघटकों के द्वारा आसानी से अपघटित किये जा सकते हैं, उन्हें अपघटनीय प्रदूषक कहते हैं। जैसे – वनस्पति एवं जंतु जगत के शरीर का अवशेष, वहित मल इत्यादि।

2. अनअपघटनीय प्रदूषक या अजैव निम्नीकरणशील प्रदूषक

वे प्रदूषक जो अपघटकों के द्वारा आसानी से अपघटित नहीं किये जा सकते हैं, उन्हें अनअपघटनीय प्रदूषक कहते हैं। जैसे – प्लास्टिक की वस्तुएं, शीशा, पारा इत्यादि।

कणिकीय प्रदूषक

हमारे वायुमंडल के वे तत्त्व जो सूक्ष्म कणों के रूप में तैरते हुए पाए जाते हैं, उन्हें कणिकीय प्रदूषकों के नाम से जाना जाता है। यह रासायनिक अभिक्रियाओं, ईंधन के दहन (उदाहरण के लिए, कोयला, लकड़ी, डीजल जलाना), औद्योगिक प्रक्रियाओं और खेती (जुताई, खेत जलाना) के माध्यम से निर्मित होता है।

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार

पर्यावरण प्रदूषण मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है, जिसमें जल, वायु, मृदा तथा ध्वनि प्रदूषण आते हैं।

  1. वायु प्रदूषण
  2. ध्वनि प्रदूषण
  3. जल प्रदूषण
  4. मृदा प्रदूषण

वायु प्रदूषण

वायुमंडल पृथ्वी पर जीवों के लिए सुरक्षा कवच की भांति कार्य करता है, जो विभिन्न गैसों का मिश्रण है। इन्हीं गैसों के अनुपात में परिवर्तन होना वायुमंडल के संतुलन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर देता है, जो वायु प्रदूषण (Air Pollution) के नाम से जाना जाता है।

वायुमंडल में 78% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन, 0.03 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड, इसके अलावा कुछ अन्य गैसें भी होती हैं। हमारे वातावरण में मौजूद यदि इन सभी के अतिरिक्त दूसरी अन्य गैसें या इनके अनुपात में परिवर्तन हो जाये तो वह वायु प्रदूषण कहलाता है।

वायु प्रदूषण के प्रमुख घटक

कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)

पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) वनस्पति जगत के लिए जीवन का कार्य सामान्य रूप से करती है। जब इसकी मात्रा वायुमंडल में सामान्य से अधिक हो जाती है तो यह वायुप्रदूषण के रूप में प्रदर्शित होने लगती है।

लकड़ियों एवं कोयले के दहन, वनस्पति एवं जंतु जगत के अवशेषों के दहन, उद्योग-धंधों एवं कल-कारखानों के दहन, जीवधारियों के श्वसन आदि से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) विमुक्त होती है।

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की अधिकता के कारण ग्रीन हॉउस प्रभाव (Green House Effect) निर्मित होता है। जो ऊपरी सतह से ऊष्मा को नीचे आने तो देता है, परन्तु उष्मा को बाहर जाने से रोक देता है, जिससे पृथ्वी की निचली परत का तापमान बढ़ जाता है। और जो जलवायु परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होता है।

कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को कम करने के उपाय

  • नये पेड़ पौधों की संख्या में वृद्धि करके,
  • उद्योग-धंधों एवं कल-कारखानों में कार्बनिक शोधक का प्रयोग करके,
  • अधिक से अधिक सार्वजनिक साधनों का उपयोग करके

आदि माध्यमों से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा को संतुलित रखा जा सकता है।

कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)

कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) उत्सर्जन जीवाश्म ईधन के दहन, लकड़ियों एवं कोयले के दहन, उद्योग-धंधों एवं कल-कारखानों के दहन, एवं सिगरेट से होने वाले दहन आदि से होता है।

कार्बन मोनो ऑक्साइड का प्रभाव

कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन के साथ अभिक्रिया करके शरीर में रक्त के प्रवाह को घटा देता है। जिससे शरीर के अन्य अंगों में ऑक्सीजन का प्रवाह घटने लगता है, और व्यक्ति को श्वास लेने में कठिनाई होने लगती है। इसलिए इसे “दमघोंटू गैस” भी कहा जाता है। इससे हृदय की गति रूक जाती है।

कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) को कम करने के उपाय

ईंधन के रूप में CNG और LPG का प्रयोग, सौर्यिक ताप का प्रयोग, आदि से इसकी मात्रा में कमी की जा सकती है।

नाइट्रोजन के ऑक्साइड (N2O, NO, NO2)

नाइट्रोजन वायुमंडल में सबसे अधिक मात्रा में लगभग 78% पायी जाती है। और नाइट्रोजन वनस्पति जगत के लिए प्रोटीन का कार्य करती है।

नाइट्रोजन के ऑक्साइड़ों का उत्सर्जन जीवाश्म ईधन के दहन, कोयले के दहन, उद्योग-धंधों एवं कल-कारखानों के दहन, एवं यातायात साधनों में होने वाले दहन के परिणाम स्वरुप होता है।

नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), नाइट्रिक ऑक्साइड (NO)नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) आदि को संयुक्त रूप से नाइट्रोजन के ऑक्साइड कहा जाता है। नाइट्रोजन के कुल पाँच स्थिर ऑक्साइड ज्ञात हैं।

नाइट्रोजन के ऑक्साइड वायुमंडल में ऊंचाई पर जलवाष्प के साथ अभिक्रिया करके नाइट्रिक अम्ल (HNO3)के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं, जो पृथ्वी पर अम्ल वर्षा के रूप में नीचे गिरते हैं।

नाइट्रोजन के ऑक्साइड का प्रभाव

  • अम्ल वर्षा से पेड़-पौधे सूख जाते हैं तथा पत्थरों पर धब्बे बनने लगते हैं।
  • मनुष्यों के मसूड़ों में सूजन एवं रक्तस्राव होने लगता है।
  • छोटे बच्चो को निमोनिया की शिकायत होने लगती है।
  • हृदय सम्बन्धी बीमारियाँ जन्म लेने लगतीं हैं।

नाइट्रोजन के ऑक्साइड को कम करने के उपाय

  • इसके लिए सौर्य ऊर्जा का अधिक से अधिक मात्रा में प्रयोग करना,
  • वाहनों में CNG का प्रयोग करना,
  • दहन के लिए LPG का प्रयोग करना,

आदि का प्रयोग करके नाइट्रोजन के ऑक्साइड और अम्ल बर्षा के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

सल्फर के ऑक्साइड (SO2, SO3)

सल्फर के ऑक्साइड का मुख्य घटक सल्फर डाइऑक्साइड (Sulfur dioxide – SO2) होता है। सल्फर के कई ऑक्साइड होते हैं। इसका उत्सर्जन मुख्य रूप से तेल शोधन शालाओं से होता है। इसके अलावा सल्फर डाइऑक्साइड जीवाश्म ईंधन, और यातायात के साधनों के द्वारा भी उत्सर्जित होती है।

सल्फर डाइऑक्साइड जब वायुमंडल में ऊचाई पर जाकर जलवाष्प के साथ अभिक्रिया करती है तब सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4)के रूप में परिवर्तित हो जाता है। जो पृथ्वी पर सबसे खतरनाक अम्ल वर्षा के रूप में नीचे गिरता है।

सल्फर के ऑक्साइड का प्रभाव

  • अम्ल वर्षा से पेड़ पौधे झुलसकर सूख जाते है तथा पत्थरों तथा संगमरमर का रंग परिवर्तित हो जाता है।
  • इसके लगातार प्रभाव से पत्थरों में दरारें आ जाती हैं। इसलिए इसे “क्रेकिंग प्रदूषक” भी कहा जाता है।

सल्फर के ऑक्साइड को कम करने के उपाय

  • इसके लिए सौर्य ऊर्जा का अधिक से अधिक मात्रा में प्रयोग करना,
  • वाहनों में CNG का प्रयोग करना,

आदि का प्रयोग करके सल्फर के ऑक्साइड और अम्ल बर्षा के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFC)

CFC का निर्माण क्लोरीन, फ्लोरीन, और कार्बन के संयोजन से होता है। इसका उत्सर्जन ठंडा करने वाले संयत्र और मशीनों आदि के द्वारा होता है।

क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFC) के प्रभाव के परिणाम स्वरुप वायुमंडल में उपस्थित ओजोन परत के कण टूटनें लगते हैं। अर्थात ओजोन परत का विनाश होने लगता है। जिससे सूर्य की पराबैगनी किरणें सीधे पृथ्वी तक पहुंचने लगती हैं।

सूर्य की पराबैगनी किरणों से सूक्ष्म वनस्पति सूखनें लगती हैं और, मनुष्यों में त्वचा कैंसर एवं मोतियाबिंदु जैसी शिकायतें होने लगती हैं।

वायु प्रदूषण का प्रभाव

वायु प्रदूषण पृथ्वी पर वनस्पति जगत, जंतु जगत, और भौतिक जगत को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। जिसका वर्णन इस प्रकार है –

वनस्पति जगत पर वायु प्रदूषण का प्रभाव

  • वायु प्रदूषण का वनस्पति जगत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके द्वारा पेड़ पौधे सूख जाते हैं।
  • अम्लीय वर्षा के परिणाम स्वरुप पेड़ पौधे जल जाते हैं।
  • जहरीली गैसों की उपस्थित में पेड़ पौधों की वृद्धि और विकास रुक जाता है।
  • अत्यधिक प्रदूषण वाले स्थानों पर प्रकाश संश्लेषण क्रिया बाधित होने लगती है, इससे पेड़ पौधों के उत्पादों में पोषक तत्वों की कमी होने लगती है।

जंतु जगत पर वायु प्रदूषण का प्रभाव

  • वायु प्रदूषण का जंतु जगत पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • इससे मनुष्यों में श्वसन सम्बन्धी समस्याएं, दमां,
  • निमोनियाँ, खांसी,
  • हृदय विकार, हृदय गति का रुकना,
  • त्वचा में झुर्रियों का आना, आदि समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

भौतिक जगत पर वायु प्रदूषण का प्रभाव

  • वायु प्रदूषण भौतिक जगत को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है,
  • इससे ग्रीन हॉउस प्रभाव का निर्माण होता है, जिससे तापमान में वृद्धि होती है।
  • वर्फ का तीव्र गति से पिघलना,
  • समुद्रों में जल स्तर का बढ़ना, आदि क्रियाएं होती हैं।
  • इसके अलावा पत्थरों के रंग में परिवर्तन, उनका फटना,
  • अम्लीय वर्षा के परिणाम स्वरुप मृदा तथा जल की गुणवत्ता में परिवर्तन आदि।

वायु प्रदूषण के रोकथाम के उपाय

  • अधिक से अधिक संख्या में वृक्षों का लगाया जाना,
  • मानवीय वस्तियों का उद्योग-धंधों एवं कल-कारखानों से दूर रखा जाना,
  • उद्योग-धंधों एवं कल-कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट के लिए फ़िल्टर का प्रयोग किया जाना,
  • दहन के लिए सौर्य ऊर्जा, CNG और LPG का प्रयोग किया जाना इत्यादि।

ध्वनि प्रदूषण

जब कम्पन के परिणाम स्वरुप सामान्य आवाज उत्पन्न होती है, तो उसे ध्वनि के नाम से जाना जाता है। जब सामान्य ध्वनि अप्रिय लगने लगती है, तो वह शोर के नाम से जानी जाती है। और जब ध्वनि की तीव्रता मनुष्य में अशांति व वेचैनी उत्पन्न करने लगती है, तब वह ध्वनि प्रदूषण के नाम से जानी जाती है।

ध्वनि की तीव्रता का मापन डेसीबल (db) में किया जाता है जो ध्वनि बढ़ते प्रभाव को प्रदर्शित करती है। डेसीबल के मापन की न्यूनतम इकाई शून्य (0) होती है। जो लगातार ध्वनि की तीव्रता के आधार पर बढ़ती चली जाती है।

शून्य db से 10 गुना ध्वनि 10 db मानी जाती है, इसकी 100 गुना ध्वनि 20 db मानी जाती है, इसकी 1000 गुना ध्वनि 30 db मानी जाती है, इसकी 10000 गुना ध्वनि 40 db के बरबार होती है।

0 db = शांत ध्वनि
10 गुना = 10 db
100 गुना = 20 db
1000 गुना = 30 db
10000 गुना = 40 db

ध्वनि की आवृत्ति (frequency) का मापन हर्ट्ज (Hz) में किया जाता है।

ध्वनि की सर्वाधिक चाल ठोस में होती है, इसके पश्चात् इससे कम द्रव में होती है, सबसे कम ध्वनि की चाल गैसों में होती है। ध्वनि की औसत चाल 332 kmh होती है।

WHO के अनुसार ध्वनि प्रदूषण

WHO द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि व्यक्ति के सोते समय यदि 35 db से अधिक, तथा जागते समय यदि 45 db से अधिक तीव्रता की ध्वनि विस्तारित होती है तो वह ध्वनि, ध्वनि प्रदूषण के अंतर्गत आएगी। यह मानक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार

  1. औद्योगिक क्षेत्र में दिन के समय 75 db से अधिक, तथा रात्रि के समय 70 db से अधिक की ध्वनि, प्रदूषण का रूप ले लेती है।
  2. व्यापारिक क्षेत्र में दिन के समय 65 db से अधिक, तथा रात्रि के समय 55 db से अधिक की ध्वनि, प्रदूषण का रूप ले लेती है।
  3. आवासीय क्षेत्र में दिन के समय 55 db से अधिक, तथा रात्रि के समय 45 db से अधिक की ध्वनि, प्रदूषण का रूप ले लेती है।
  4. शांत क्षेत्र में दिन के समय 50 db से अधिक, तथा रात्रि के समय 40 db से अधिक की ध्वनि, प्रदूषण का रूप ले लेती है।

ध्वनि प्रदूषण के श्रोत

जैविक श्रोत

शेर का दहाड़ना, हाथी का चिंघाड़ना, कुत्ते का भौकना, मनुष्य का हंसना, मनुष्य का रोना इत्यादि ध्वनि प्रदूषण के जैविक श्रोत के अंतर्गत आते हैं।

कृत्रिम श्रोत

यातायात के साधन, उद्योग-धंधे एवं कल-कारखाने, जेट वायुयान का संचालन, शादी एवं पार्टियों के डीजे इत्यादि ध्वनि प्रदूषण के कृत्रिम श्रोत के अंतर्गत आते हैं।

स्थान के आधार पर भारत में ध्वनि प्रदूषण के मानक

  1. टेलीविज़न और रेडिओ कक्ष – 25 to 35 db
  2. संगीत कक्ष – 30 to 35 db
  3. हॉस्टल, ऑडिटोरियम, सम्मेलन कक्ष – 35 to 40 db
  4. कोर्ट, पुस्तकालय, निजी कार्यालय – 40 to 45 db
  5. सार्वजनिक बैंक, स्टोर – 45 to 50 db
  6. रेस्टोरेंट – 50 to 55 db

ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव

ध्वनि के प्रदूषण से श्रवण शक्ति का ह्रास, बेचैनी, चिड़चिड़ापन एवं आक्रामकता के अतिरिक्त उच्च रक्तचाप, तनाव, कर्णक्ष्वेड, नींद में गड़बड़ी और अन्य हानिकारक प्रभाव पैदा कर सकता है।

ध्वनि प्रदूषण के रोकथाम के उपाय

  • ग्रीन मफलर – सडकों के किनारे, नहरों के किनारे, रेलवे लाइनों के किनारे कतारवद्ध ढंग से लगाना, जिससे उत्सर्जित ध्वनि प्रदूषण की मात्रा घट जाती है या का कम हो जाती है।
  • कम शोर करने वाले मशीनों-उपकरणों का निर्माण एवं उपयोग किए जानेपर बल देना चाहिए।
  • अधिक ध्वनि उत्पन्न करने वाले मशीनों को ध्वनिरोधी कमरों में लगाना चाहिए तथा कर्मचारियों को ध्वनि अवशोषक तत्वों का उपयोग करना चाहिए।
  • उद्योगों एवं कारखानों को शहरों या आबादी से दूर स्थापित करनाचाहिए।
  • वाहनों में लगे हार्नों को तेज बजाने से रोका जाना चाहिए।

जल प्रदूषण

बढ़ती हुई जनसंख्या और औद्योगिक विस्तारण के कारण जल के अविवेकपूर्ण उपयोग से जल की गुणवत्ता का बहुत अधिक निम्नीकरण हुआ है। नदियों, नहरों, झीलों तथा तालाबों आदि में उपलब्ध जल शुद्ध नहीं रह गया है।

इसमें अल्प मात्रा में निलंबित कण, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ समाहित होते हैं। जब जल में इन पदार्थों को सांद्रता बढ़ जाती है तो जल प्रदूषित हो जाता है और इस तरह वह उपयोग के योग्य नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में जल में स्वतः शुद्धीकरण की क्षमता जल को शुद्ध नहीं कर पाती।

यद्यपि, जल प्रदूषण प्राकृतिक स्रोतों (अपरदन, भू-स्खलन और पेड़-पौधों तथा मृत पशु के सड़ने गलने आदि) से प्राप्त प्रदूषकों से भी होता है, तथापि मानव क्रियाकलापों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषक चिंता के वास्तविक कारण हैं। मानव, जन को उद्योगों, कृषि एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से प्रदूषित करता है। इन क्रियाकलापों में उद्योग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सहायक है।

सन्निहित जल प्रदूषण जल प्रदूषण के श्रोत
बदबू, घुलित एवं निलंबित ठोस कण, अमोनिया तथा यूरिया, नाइट्रेट एवं नाइट्राइट्स, क्लोराइड्स, फ्लोराइड्स, कार्बोनेट्स, तेल एवं ग्रीस (चिकनाई), कीटनाशकों एवं पीड़कनाशी के अवशेष, टैनिन, कोलीफार्म एम पी एम (जीवाणु गणना), सल्फेट्स एवं सल्फाइड्स, भारी धातुएँ जैसे कि सीसा, आर्सेनिक, पारा, मैंगनीज़ आदि रेडियोधर्मी पदार्थ तत्त्व वाहित मल निपटान, नगरीय वाही जल, उद्योगों के विषाक्त कृषित भूमि के ऊपर से बहता जल बहि:स्राव तथा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र

उत्पादन प्रक्रिया में, उद्योग अनेक अवांछित उत्पाद पैदा करते हैं जिनमें औद्योगिक कचरा, प्रदूषित अपशिष्ट जल, ज़हरीली गैसें, रासायनिक अवशेष, अनेक भारी धातुएँ, धूल, धुआँ आदि शामिल होता है।

अधिकतर औद्योगिक कचरे को बहते जल में अथवा झीलों आदि में विसर्जित कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप विषाक्त रासायनिक तत्व जलाशयों, नदियों तथा अन्य जल भंडारों में पहुँच जाते हैं जो इन जलों में रहने वाली जैव प्रणाली को नष्ट करते हैं। सर्वाधिक जल प्रदूषक उद्योग-चमड़ा, लुगदी व कागज़, वस्त्र तथा रसायन हैं।

आधुनिक कृषि में विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है जैसे कि अकार्बनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशक आदि भी प्रदूषण उत्पादन करने वाले घटक हैं। इन रसायनों को नदियों, झीलों तथा तलाबों में बहा दिया जाता है। यह सभी रसायन जल के माध्यम में जमीन में सवित होते हुए भू जल तक पहुँच जाते हैं।उर्वरक धरातलीय जल में नाइट्रेट की मात्रा को बढ़ा देते हैं।

भारत में तीर्थ यात्राओं, धार्मिक मेले व पर्यटन आदि जैसी सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी जल प्रदूषण का कारण हैं। भारत में, धरातलीय जल के लगभग सभी स्रोत संदूषित हो चुके हैं और मानव के उपयोग के योग्य नहीं है।

जल प्रदूषण विभिन्न प्रकार की जल जनित बीमारियों का एक प्रमुख स्रोत होता है। संदूषित जल के उपयोग के कारण प्रायः दस्त (डायरिया), आँतों के कृमि, हेपेटाइटिस
जैसी बीमारियाँ होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत में लगभग एक-चौथाई संचारी रोग जल-जनित होते हैं।

यद्यपि नदी प्रदूषण सभी नदियों से संबंधित है, लेकिन गंगा नदी जो भारत के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से होकर बहती है, का प्रदूषण सभी के लिए चिंता का विषय है। गंगा
नदी की स्थिति में सुधार के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर गंगा सफ़ाई राष्ट्रीय अभियान शुरू किया गया था। वर्तमान ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम इसी से संबंधित है।

नमामि गंगे कार्यक्रम

एक नदी के रूप में गंगा का राष्ट्रीय महत्व है, लेकिन प्रदूषण को नियत्रित करके नदी के संपूर्ण मार्ग की सफाई की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ ‘नमामि गंगे‘ कार्यक्रम आरंभ किया है-

  • शहरों में सीवर ट्रीटमेंट की व्यवस्था कराना।
  • औद्योगिक प्रवाह की निगरानी।
  • नदियों का विकास।
  • नदी के किनारों पर बनीकरण जिससे जैवविविधता में वृद्धि हो।
  • नदियों के तल की सफ़ाई।
  • उत्तराखंड, यू.पी., बिहार, झारखंड में ‘गंगा ग्राम‘ का विकास करना।

नदी में किसी भी प्रकार के पदार्थों को न डालना भले ही वे किसी अनुष्ठान से संबंधित हो, इससे प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है। इसके संबंध में लोगों में जागरूकता पैदा करना।

मृदा प्रदूषण

कृषि योग्य भूमि पर दबाव का कारण केवल सीमित उपलब्धता ही नहीं, वरन इसकी गुणवत्ता में कमी भी इसका कारण है। मृदा अपरदन, लवणता (जलाक्रांतता) तथा भू-क्षारता से भू-निम्नीकरण होता है।

सन्निहित मृदा प्रदूषण मृदा प्रदूषण के श्रोत
मानव एवं पशु मलादि विषाणु तथा जीवाणु तथा रोगवाहक विरलन कीटनाशक एवं उर्वरक अवशिष्ट क्षारीयता, फ्लोराइड्स, रेडियोधर्मी पदार्थ अनुचित मानव क्रियाकलाप, अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट का निपटान, पीड़कनाशी एवं उर्वरकों का उपयोग।

भू-उर्वरकता के अप्रबंधन के साथ इसका अविरल, उपयोग होने पर क्या स्थिति होगी? भू-निम्नीकरण होगा तथा उत्पादकता में कमी आएगी। भू-निम्नीकरण का अभिप्राय स्थायी या अस्थायी तौर पर भूमि की उत्पादकता की कमी है।

यद्यपि सभी निम्नकोटि भूमियाँ व्यर्थ भूमि नहीं हैं, लेकिन अनियंत्रित प्रक्रियाएँ इसे व्यर्थ भूमि में परिवर्तित कर देती हैं। भूनिम्नीकरण दो प्रकियाओं द्वारा तीव्रता से होता है। ये प्रक्रियाएँ प्राकृतिक तथा मानवजनित हैं।

भारतीय दूर-संवेदन संस्थान ने व्यर्थ भूमि को दूर-संवेदन तकनीक की सहायता से सीमांकित किया है और इन प्रक्रियाओं के आधार पर इनको वर्गीकृत किया जा सकता है।

जैसे प्राकृतिक खड्डु, मरुस्थलीय या तटीय रेतीली भूमि, बंजर चट्टानी क्षेत्र, तीव्र ढाल वाली भूमि तथा हिमानी क्षेत्र। ये मुख्यतः प्राकृतिक कारकों द्वारा घटित हुई हैं। प्राकृतिक तथा मानवजनित प्रक्रियाओं से निम्नकोटि भूमियों में जलाक्रांत व दलदली क्षेत्र, लवणता व क्षारता से प्रभावित भूमियाँ; झाड़ी सहित व झाड़ियों रहित भूमियाँ आदि सम्मिलित हैं।

कुछ अन्य निम्नकोटि भूमियाँ भी हैं जैसे- स्थानांतरित कृषि जनित क्षेत्र, रोपण कृषि जनित, क्षरित वन, क्षरित चरागाह तथा खनन व औद्योगिक व्यर्थ क्षेत्र जो मानवीय प्रक्रियाओं से कृषि के अयोग्य हुई हैं। प्राकृतिक प्रक्रियाओं की अपेक्षा मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा अधिक व्यर्थ भूमि का विस्तार हुआ है।

Related Post