संश्लेषित रेशे क्या हैं? कृत्रिम सूत (Synthetic fibers)

प्राकृतिक रेशो के स्थान पर प्रयोग होने वाले मानव निर्मित रेशे जैसे- रेयॉन, नायलॉन, टेरीलीन, डेक्रॉन, टेरीन आदि को संश्लेषित रेशे (कृत्रिम सूत – Synthetic fibers) कहते हैं।

इनका उपयोग प्राकृतिक रेशों जैसे- ऊन तथा रेशम के स्थान पर होता है। संश्लेषित रेशे प्रायः ऊन तथा रेशम की भाँति ही दिखने वाले बनाए जाते हैं।

Sanshleshit Reshe or Kritrim Reshe
Sanshleshit Reshe or Kritrim Reshe

संश्लेषित रेशे (कृत्रिम सूत – Synthetic fibers) वे सूत या रेशे हैं जिन्हें प्राकृतिक रूप से (जानवरों एवं पौधों) नहीं बल्कि कृत्रिम रूप से वनाया जाता है। सामान्य रूप से कहा जाय तो सूत बनाने वाले पदार्थ को किसी पतले छिद्र से बल पूर्वक भेजकर सूत का निर्माण किया जाता है। जैसे- रेयॉन, नायलॉन, टेरीलीन, डेक्रॉन, टेरीन आदि।

संश्लेषित रेशे (कृत्रिम सूत – Synthetic fibers) के उदाहरण

  • एकतंतु धागा (monofilament): इसमें केवल एक तंतु होता है।
  • फिलामेंट धागा (Filament yarn): इन धागों में अनेक महीन अखंड तंतु (filament) होते हैं, जो हलकी ऐंठन से एक साथ जुड़े रहते हैं।
  • स्टेप्ल (staple): ये कृत्रिम तंतुओं के बने होते हैं और ये 7 से 15 इंच तक लंबे और एकरूप होते हैं
  • कते धागे (Spun yarn): ये धागे कृत्रिम रेशों को कातकर बनाए जाते हैं। कभी-कभी ये कृत्रिम रेशे कपास, ऊन, पटसन इत्यादि रेशों के मिश्रण से भी बनते हैं।
  • टो (Tow): इसमें भी अनेक अखंड तंतु, रस्सी के रूप में, एक साथ बैटे रहते है, किंतु उनमें ऐंठन नहीं होती तथा वे समांतर रहते हैं। छोटे टो 500 से 5000 डेनियर (Denier) तक के होते हैं, जबकि बड़े टो 75,000 से 5,00,000 डेनियर के होते हैं।

संश्लेषित रेशे या कृत्रिम रेशे का उद्गम

संश्लेषित ढंग से सूत (रेशा, Fibre) निर्माण करने का विचार पहले पहल एक अंग्रेज वैज्ञानिक राबर्ट हुक के दिमाग में उठा था। इसका उल्लेख 1664 ई. में प्रकाशित उसकी माइक्रोग्राफिया नामक पुस्तक में है। इसके बाद 1734 ई. में एक फ्रेंच वैज्ञानिक ने रेजिन से संश्लेषित सूत बनाने की बात कही; लेकिन उसे भी कोई व्यावहारिक रूप नहीं दिया जा सका।

1842 ई. में पहली बार अंग्रेज वैज्ञानिक लुइस श्वाब ने संश्लेषित सूत बनाने की मशीन का आविष्कार किया। इस मशीन में महीन सूराखवाले तुंडों (nozzles) का प्रयोग किया गया जिसमें से होकर निकलनेवाला द्रव पदार्थ सूत में परिवर्तित हो जाता था। सूत बनानेवाली आज की मशीनों का भी मुख्य सिद्धांत यही है।

श्वाब ने काँच से सूत का निर्माण किया था; लेकिन वह इससे संतुष्ट न था। उसने ब्रिटिश वैज्ञानिकों से संश्लेषित सूत बनाने हेतु अच्छे पदार्थ की खोज की अपील की। 1845 ई. में स्विस रसायनशास्त्री सी. एफ. शूनबेन ने कृत्रिम सूत के निर्माण के निमित्त नाइट्रो सेल्यूलोज की खोज की।

संश्लेषित सूत के निर्माण का पहला पेटेंट 1855 में जार्ज एडेमर्स ने प्राप्त किया। उसने कृत्रिम सूत के निर्माण के लिए शहतूत और कुछ अन्य वृक्षों के भीतरी भाग का प्रयोग किया। शहतूत के वृक्ष के भीतरी भाग को पहले उसने नाइट्रीकृत किया। फिर ईथर और ऐलकोहल के साथ-साथ रबर के विलयन में उसका मिश्रण तैयार किया। फिर उसका उपयोग उसने कृत्रिम सूत के निर्माण के लिए किया।

दो वर्ष बाद ई. जे. हग्स को कुछ लचीले पदार्थो जैसे स्टार्च, ग्लेटिन, रेजिन, टैनिन और चर्बी आदि से संश्लेषित सूत के निर्माण के लिए पेटेंट मिला। इसके बाद जोसेफ स्वान ने इस दिशा में और अधिक कार्य किया। तब से अब तक इस क्षेत्र में अनेक वैज्ञानिकों ने बहुत काम किया है। फलस्वरूप अनेक प्रकार के कृत्रिम सूत बाजार में उपलब्ध हैं। भारत में संश्लेषित सूत का निर्माण 1950 ई. में आरंभ हुआ।

जब प्रयोगशाला में पहले पहल संश्लेषित सूत बने तब रंगरूप, कोमलता और चमक दमक में वे रेशम से थे, यद्यपि उनकी दृढ़ता और टिकाऊपन रेशम के बराबर नहीं थी। उनका तनाव सामर्थ्य भी निम्न कोटि का था। फिर भी उन्हें कृत्रिम रेशम का नाम दिया गया।

1924 ई. तक ऐसे मानवनिर्मित सूतों को संश्लेषित रेशम ही कहते थे। बाद में अमरीका में संश्लेषित सूत के लिए रेयन शब्द का उपयोग आरंभ हुआ और आज सारे संसार में कृत्रिम सूत के लिए रेयन शब्द का ही उपयोग होता है।

भारत वर्ष मे पिथौरागड़ के श्री पीताम्बर पाण्डेय जो एक पेट्रोलियम अभियंता थे, उनके द्वारा भी संश्लेषित रेशा का अविष्कार किया गया था लकिन अल्प काल मृत्यु के कारण वह उसे व्यवसायी रूप नहीं दे पाये।

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