कविताएँ, Hindi Poems, Poetry, Poems in Hindi

चेतक की वीरता

रण-बीच चौकड़ी भर-भरकर
चेतक बन गया निराला था।

राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा को पाला था।

गिरता न कभी चेतक-तन पर
राणा प्रताप का कोड़ा था।

वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर
या आसमान पर घोड़ा था।

जो तनिक हवा से बाग़ हिली
लेकर सवार उड़ जाता था।

राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था।

कौशल दिखलाया चालों में
उड़ गया भयानक भालों में।

निर्भीक गया वह ढालों में
सरपट दौड़ा करवालों में।

है यहीं रहा, अब यहाँ नहीं
वह वहीं रहा है वहाँ नहीं।

थी जगह न कोई जहाँ नहीं
किस अरि-मस्तक पर कहाँ नहीं।

बढ़ते नद-सा वह लहर गया
वह गया गया फिर ठहर गया।

विकराल बज्र-मय बादल-सा
और की सेना पर घहर गया।

भाला गिर गया, गिरा निषंग,
हय-टापों से खन गया अंग।

वैरी-समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग।

वीर रस की कविता

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

Hindi Mein Poem

लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा

अंतिम आशाओं की संध्याओं से?
पलकें डूबी ही-सी थीं—

पर अभी नहीं;
कोई सुनता-सा था मुझे

कहीं;
फिर किसने यह, सातों सागर के पार

एकाकीपन से ही, मानो—हार,
एकाकी उठ मुझे पुकारा

कई बार?
मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल

जीवन;
कण-समूह में हूँ मैं केवल

एक कण।
—कौन सहारा!

मेरा कौन सहारा!

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