हिन्दी की बोलियाँ
हिन्दी की बोलियाँ या हिन्दी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ: हिन्दी भाषा विशाल भू-भाग की भाषा होने के कारण हिन्दी की अनेक बोलियाँ अलग-अलग क्षेत्रों में प्रयुक्त होती हैं जिनमें से विशेष उल्लेखनीय निम्नलिखित हैं-
- पश्चिम में – हरियाणवी, खड़ी बोली, ब्रजभाषा, बुंदेली और राजस्थानी
- पूर्व में – अवधी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी और मैथिली
- उत्तर में – गढ़वाली और कुमाऊँनी
- दक्षिण में – दक्खिनी
हिन्दी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में इन सभी बोलियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इन बोलियों और उपभाषाओं में से कुछ में उच्चकोटि का साहित्य रचा गया है।
- ‘मैथिली” में कोकिला विद्यापति की अमर काव्य कृति ‘पदावली” रची गई,
- ‘अवधी” में हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ काव्यग्रन्थ “रामचरितमानस” की रचना तुलसीदास ने तथा पद्मावत की रचना मुसलमान कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने की।
- अवधी में प्रबन्ध काव्य परम्परा विशेषतः विकसित हुई।
- ब्रजभाषा तो मध्यकाल की सर्वप्रमुख काव्य-भाषा रही है।
- कृष्ण काव्य का विशाल साहित्य मुख्यतः ब्रजभाषा में ही है।
इस भाषा में सूरदास, नन्ददास रसखान, रहीम, केशव, बिहारी, मतिराम, भूषण, पद्माकर जैसे श्रेष्ठ कवि हुए।
सूरदास का “सूरसागर” ब्रजभाषा की अमर काव्यकृति है।
- राजस्थान में हिन्दी में मीराबाई ने श्रेष्ठ काव्य की रचना की।
- खड़ी बोली के प्रथम प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो थे।
आज यही खडी बोली देश की राष्ट्रभाषा और भारतीय गणराज्य की राजभाषा है।
- “कामायनी” खड़ी बोली का प्रसिद्ध काव्य है।
हिन्दी में अतुकान्त महाकाव्य लिखने का श्रेय सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला” को है। गद्य-साहित्य के विविध रूपों में हिन्दी खड़ी बोली ने बहुत विकास किया है। हिन्दी भाषा के विविध रूपों में आजकल ‘खड़ी बोली” ही सबसे अधिक प्रचलित है, जिसक विकास पश्चिमी हिन्दी से हुआ है।
इन बोलियों के अलावा भी आज हिन्दी के राष्ट्रीय स्तर पर अनेक रूप विकसित हो गए हैं, जैसे-बम्बइया हिन्दी, कलकतिया हिन्दी, हैदराबादी हिन्दी आदि। ये रूप वहाँ की मातृभाषा तथा हिन्दी के संयोग से विकसित हुए हैं। आज दिल्ली की हिन्दी भी अपना स्वरूप अलग बना चुकी है।
हिन्दी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ
पश्चिमी खण्ड की हिन्दी की बोलियाँ
| पश्चिमी हिन्दी आकार बहुला | पश्चिमी हिन्दी | राजस्थानी हिन्दी उकार बहुला | पहाड़ी हिन्दी |
|---|---|---|---|
| कौरवी (खड़ी बोली) | बृज भाषा | मारवाड़ी | कुमाउनी |
| हरियाणी | बुंदेली | ढूंढाड़ी | गढ़वाली |
| दक्खिनी | कन्नौजी | मेवाती | मालवी |
पूर्वी खण्ड की हिन्दी की बोलियाँ
| पूर्वी हिन्दी | बिहारी हिन्दी |
|---|---|
| अवधी | भोजपुरी |
| बधेली | मगही |
| छत्तीसगढ़ी | मैथिली |
पश्चिमी हिन्दी
पश्चिमी हिन्दी की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है। पश्चिमी हिन्दी का प्रदेश पंजाबी और राजस्थानी पूर्व से आरम्भ होकर पूर्व में बधेली और अवधी तक फैला हुआ है। इसकी उत्तरी सीमा पहाड़ी और दक्षिणी सीमा मराठी मानी जाती है। साहित्य जगत् में पश्चिमी हिन्दी की प्रधानता रही है। हिन्दी का ब्रजभाषा साहित्य इसके साहित्य की विपुलता का प्रमाण है। पश्चिमी हिन्दी की दो प्रकार की-आकार बहुला तथा उकार बहुला-बोलियाँ हैं।
