दोहे – Dohe, Hindi Couplets, Dohe in Hindi

दोहा: दोहा एक मासिक छंद है जिसके प्रथम और तृतीय चरण में 13, 13 मात्राएं होती है। और दूसरे और अंतिम चरण में 11, 11 मात्राएं होती है। इसमें 24, 24 मात्रा की दो पंक्तियां होती है।

1. कबीर दास के दोहे (साखी एवं मीठी वाणी)

दोहा:

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥

अर्थ: हमें अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए, जिससे सुनने वाले को भी सुख (शीतलता) मिले और हमारा अपना मन भी शांत और प्रसन्न रहे।


दोहा:

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होइ॥

अर्थ: बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर संसार में कितने ही लोग चले गए, लेकिन कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बन सका। जो व्यक्ति प्रेम के केवल ढाई अक्षर को अच्छी तरह पढ़ और समझ लेता है (अर्थात मानवता से प्रेम करता है), वही वास्तविक पंडित है।


2. रहीम दास के दोहे (कक्षा 6, 7, 8, 9 और 12 के पाठ्यक्रम से)

दोहा:

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥

अर्थ: रहीम जी कहते हैं कि प्रेम रूपी धागे को कभी भी झटके से नहीं तोड़ना चाहिए (अर्थात आपसी रिश्तों को लड़ाई-झगड़े से खत्म नहीं करना चाहिए)। क्योंकि यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाए, तो फिर पहले की तरह जुड़ता नहीं है और अगर जुड़ भी जाए, तो उसमें एक गाँठ (मन में दरार) रह जाती है।


दोहा:

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
विपति कसौटी जे कसे, तेई सांचे मीत॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते हैं कि जब हमारे पास धन-दौलत (संपत्ति) होती है, तो बहुत से लोग हमारे सगे और मित्र बन जाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति विपत्ति या संकट के समय हमारे काम आता है, वही हमारा सच्चा मित्र होता है।


3. तुलसी दास के दोहे (रामायण / रामचरितमानस)

दोहा:

तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥

अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि संकट के समय केवल यही चीजें मनुष्य का साथ देती हैं: उसकी विद्या (ज्ञान), विनम्रता, बुद्धि (विवेक), साहस, अच्छे कर्म, सत्य का पालन और भगवान राम (ईश्वर) पर अटूट विश्वास।


दोहा:

काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान।
तौ लौं पण्डित मूरखौ, तुलसी एक समान॥

अर्थ: जब तक मनुष्य के मन में काम, क्रोध, अहंकार और लोभ (लालच) का वास रहता है, तब तक एक बड़े विद्वान (पंडित) और एक मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता, दोनों एक समान ही होते हैं।


4. चेतावनी दोहे (जीवन की सच्चाई और सजगता)

दोहा (कबीर दास):

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोए।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोए॥

अर्थ (चेतावनी): मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तू मुझे अपने पैरों से कुचल रहा है, लेकिन अहंकार मत कर। एक दिन ऐसा समय (मृत्यु) आएगा, जब तू इसी मिट्टी में मिल जाएगा और मैं तुझे अपने अंदर विलीन (रौंद) कर लूंगी। यह दोहा मनुष्य को जीवन की नश्वरता की चेतावनी देता है।


दोहा (रहीम दास):

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि॥

अर्थ (चेतावनी): रहीम जी चेतावनी देते हुए कहते हैं कि बड़े या अमीर लोगों को देखकर कभी भी छोटे या गरीब लोगों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए (उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए)। क्योंकि जहाँ कपड़े सिलने के लिए सुई काम आती है, वहाँ तलवार कोई काम नहीं कर सकती। हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।

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