तत्पुरुष समास
- “उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः तत्पुरुष“ – समास में उत्तरपद के अर्थ की प्रधानता रहती है।
- “परलिंग तत्परुषे“– तत्पुरुष समास होने पर समस्त भाग को उत्तरपद का लिंग प्राप्त होता है। जैसे—धान्येन अर्थः- धान्यार्थः ।
- “रात्राहनाः पुमांसः” – तत्पुरुष समास होने से समस्त भाग के अन्तस्थित रात्र अहन और अह पुंल्लिग होते हैं।
- “रात्रं नपुंसक संख्यापूर्वम्” – संख्यावाचक शब्द पूर्व में रहने पर “रात्र” शब्द नपुंसकलिंग होता है।
- “पुण्यादहः” – “पुण्य” शब्द के परवर्ती ‘अह” नपुंसक लिंग होता है।
तत्पुरुष समास के भेद
- व्यधिकरण तत्पुरुष
- समानाधिकरण तत्पुरुष
व्यधिकरण तत्पुरुष समास
वि + अधिकरण = व्यधिकरण पूर्व पद में जो विभक्तियाँ लगी होती हैं, वे भिन्न भिन्न होती हैं। इन्हीं के नाम पर इसमें आनेवाले तत्पुरुषों के नाम रखे गए हैं। ये 6 प्रकार के होते हैं-
- द्वितीया तत्पुरुष
- तृतीया तत्पुरुष
- चतुर्थी तत्पुरुष
- पंचमी तत्पुरुष
- षष्ठी तत्पुरुष
- सप्तमी तत्पुरुष
1. द्वितीया तत्पुरुष
द्वितीया तत्पुरुष समास के उदाहरण एवं उनके हिन्दी अर्थ
| समास-विग्रह | समस्तपद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| कृष्णश्रितः | कृष्णं श्रितः | (कृष्ण को प्राप्त) |
| दुःखातीतः | दुःखम् अतीतः | (दुःख को पार कर गया हुआ) |
| कूपपतितः | कूपम् पतितः | (कुएँ में गिरा हुआ) |
| तुहिनात्यस्तः | तुहिनम् अत्यस्तः | (बर्फ में फंसा हुआ) |
| जीवनप्राप्तः | जीवनम् प्राप्त | (जीवन को प्राप्त) |
| सुखापन्नः | सुखम् आपन्नः | (सुख को पाया हुआ) |
| गर्तपतितः | गर्त्तम् पतितः | (गड्ढे में गिरा हुआ) |
| अस्तंगतः | अस्तम् गतः | (अस्त को प्राप्त) |
| धनापन्नः | धनम् आपन्नः | (धन को प्राप्त) |
| ग्रामयमी – | ग्रामं गमी | गाँव को जानेवाला) |
| कष्टश्रितः | कष्टं श्रितः | – |
| खट्वारूढ़ः | खट्वाम् आरुढ़ः | खाट पर बैठा हुआ) |
| मासगम्यः | मासं गम्यः। | – |
| वर्षभोग्यः | वर्ष भोग्यः | – |
| स्वायंकृतिः | स्वयं कृतस्यापत्यम् | – |
| मासप्रमितः | मासं प्रमितः | – |
| मुहूर्तसुखम् | मुहूर्त सुखम् | – |
2. तृतीया तत्पुरुष समास
तृतीयान्त सुबन्त पद का तत्कृत गुणवाचक शब्द के साथ और अर्थ के साथ। समास होता है।
“कर्तृकरणे कृता बहुलम्”
यदि पहला पद कर्ता हो और तृतीया विभक्ति से युक्त हो या पहला पद करण कारक में हो और दूसरा पद कृदन्त तो इन दोनों का तृतीया तत्पुरुष समास होता है। जैसे –
- नखैः भिन्नः (तृतीया विभक्ति) = नखभिन्नः (कृदन्त)
“पूर्व सदृश समोनार्थजजजकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः”
तृतीयान्त सुबन्त पद पूर्वादि शब्दों के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे-
- मासेन पूर्वः = मासपूर्वः
तृतीया तत्पुरुष समास के उदाहरण एवं उनके हिन्दी अर्थ
| समास-विग्रह | समस्तपद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| व्यासेन कृतम् | व्यासकृतम् | व्यास द्वारा किया |
| शंकुलया खण्डः | शंकुलाखण्डः | शंकुल (सरीते) से खण्ड किया |
| धान्येन अर्थः | धान्यार्थः | अन्न से मतलव |
| बाणेन बेधः | बाणवेधः | बाण से वेधा हुआ |
| दानेन अर्थः | दानार्थः | दान से प्रयोजन |
| मासेन पूर्वः | मासपूर्वः | माह से पहले |
| पित्रा सदृशः | पितृसदृशः | पिता के समान |
| भ्रात्रा समः | भ्रातृसमः | भाई के समान |
| ज्ञानेन हीनः | ज्ञानहीनः | ज्ञान से हीन । |
| वाचा कलहः | वाक्कलहः | बाताबाती / गाली-गलौज |
| आचारेण निपुणः | आचारनिपुणः | आचार से निपुण |
| गुडेन मिश्रः | गुडमिश्रः | गुड़ से मिला हुआ । |
| आचारेण श्लक्ष्णः | आचारश्लक्ष्णः | आचरण में सहज |
| हरिणा त्रातः | हरित्रातः | हरि के द्वारा रक्षित |
| धर्मेण रक्षितः | धर्मरक्षितः | धर्म से रिक्षत |
| नखैः भिन्नः | नखभिन्नः | नखों से भिन्न किया गया |
| सर्पण दष्तः | सर्पदष्तः | साँप से डॅसा गया |
| मासेन अवरः | मासावरः | एक मास छोटा |
| मात्रा सदृशः | मातृसदृशः | माता के समान |
3. चतुर्थी तत्पुरुष समास
इस समास में पहला पद चतुर्थी विभक्ति में रहता है।
‘चतुर्थीतदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः“ – चतुर्थ्यन्त सुबन्त पदों का ‘तदर्थ” तथा ‘हित” के अर्थ में समास होता है।
चतुर्थी तत्पुरुष समास के उदाहरण एवं उनके हिन्दी अर्थ
| समास-विग्रह | समस्तपद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| यूपाय दारु | यूपदारु | यूप के लिए लकड़ी |
| रन्धनाय स्थाली | रन्धनस्थाली | राँधने के लिए थाली |
| भूताय बलिः | भूतबलिः | जीव के लिए बलि |
| गवे हितम् | गोहितम् | गाय के लिए भलाई । |
| पित्रे सुखम | पितृसुखम् | पिता के लिए सुख |
| गवे रक्षितम् | गोरक्षितम् | गाय के लिए रखा गया । |
| द्विजाय सूपम् | द्विजार्थसूपः | द्विज के लिए दाल |
4. पंचमी तत्पुरुष समास
इस समास में पहला पद पंचमी विभक्ति युक्त होता है। ‘पंचमीभयेन” भयार्थक शब्दों के योग में पंचम्यन्त शब्दों का समास होने पर पंचमी तत्पुरुष समास होता है। जैसे- चोरात् भयम् = चौरभयम् = चोर से भय ‘अपेतापोठमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः” – अपेतादि शब्दों के साथ पंचमी तत्पुरुष समास होता है।
जैसे- सुखात् अपेतः = सुखापेतः – सुख से दूर। अन्य उदाहरण-
| समास-विग्रह | समस्तपद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| प्रेतात् भीतिः | प्रेतभीतिः | प्रेत से डर |
| सर्पात् भीतः | सर्पभीतः | सर्प से डरा हुआ |
| व्याघ्रात भीतः | व्याघ्रभीतः | बाघ से डर |
| गृहात् निर्गतः | गृहनिर्गतः | घर से निकला हुआ |
| आचारात् भ्रष्टः | आचारभ्रष्टतः। | आचारण से भ्रष्ट |
| धर्मात् च्युतः | धर्मच्युतः । | धर्म से च्युत । |
| वृक्षात् पतितः | वृक्षपतितः | वृक्ष से गिरा हुआ |
| बन्धनात् मुक्तः | बंधनमुक्तः | बंधन से मुक्त |
| वृकात् भीतिः | वृकभीतिः | भेड़िये से भय । |
| कल्पनायाः अपोठः | कल्पनापोठः | कल्पना से शून्य |
| स्वर्गात् पतितः | स्वर्गपतितः | स्वर्ग से पतित |
| तरंगात् अपत्रस्तः | तरंगापत्रस्तः | तरंग से घबराया हुआ |
5. षष्ठी तत्पुरुष समास
‘षष्ठी”- षष्ठ्यन्त सुबन्त का समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है। परन्तु; ‘यतश्च निर्धारणम्” सूत्र से निर्धारण में होनेवाली षष्ठी विभक्ति का समास नहीं होता। जैसे- कवीनां कालिदासः श्रेष्ठः (कवियों में कालिदास श्रेष्ठ ) इसमें समास नहीं हुआ है।
षष्ठी तत्पुरुष समास के उदाहरण
| समास-विग्रह | समस्तपद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| गजानां राजा | गजराजः | गजों का राजा |
| राष्ट्रस्य पतिः | राष्ट्रपतिः | राष्ट्र का पति / स्वामी। |
| राज्ञः पुरुषः | राजपुरुषः | राजा का पुरुष |
| राज्ञः पुत्रः | राजपुत्रः | राजा का पुत्र |
| गंगायाः जलम् | गंगाजलम् | गंगा का जल |
| देवानां भाषा | देवभाषा | देवभाषा |
| पशूनां पतिः | पशुपतिः | पशुओं का पति / स्वामी |
| द्विजानां राजा | द्विजराजः | द्विजों का राजा |
| पाठस्य शाला | पाठशाला | पाठ का शाला / घर |
| विद्यायाः आलयः | विद्यालयः | विद्या का आलय /घर |
| सूर्यस्य उदयः | सूर्योदयः | सूर्य का उदय |
| जगतः अम्बा | जगदम्बा | जगत् की अम्बा / माता |
| नराणाम् इन्द्रः | नरेन्द्रः | नरों का द्वन्द्र राजा |
| मातुः जंघा | मातृजंघा | माता की जाँघ |
| मूषिकाणां राजा | मूषिकराजः | चूहों का राजा |
| कपोतानाम् राजा | कपोतराजः | कबूतरों का राजा |
| काल्पाः दासः | कालिदासः | काली का दास |
| विप्रस्य पुत्रः | विप्रपुत्रः | विप्र / ब्राह्मण का पुत्र |
| नद्याः तटम् | नदीतटम् | नदी का तट |
| जलस्य प्रवाहः | जलप्रवाहः | जल का प्रवाह |
| रक्षसां सभा | रक्षः सयम् | राक्षसों की सभा |
| धर्मस्य सभा | धर्मसभा | धर्म की सभा |
| विदुषां सभा | विद्वत्सभा | विद्वानों की सभा |
6. सप्तमी तत्पुरुष समास
इसमें पूर्वपद सप्तम्यन्त रहता है। ‘सप्तमी शौण्डैः – सप्तम्यन्त शौण्ड (चालाक / धूर्त / निपुण) आदि शब्दों के साथ सदा सप्तमी तत्पुरुष समास होता है।
सप्तमी तत्पुरुष समास के उदाहरण
| समास-विग्रह | समस्तपद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| अक्षेषु शौण्डः | अक्षशौण्डः | जुए में धूर्त / निपुण |
| शास्त्रे प्रवीणः | शास्त्रप्रवीणः | शास्त्र में प्रवीण |
| सभायां पण्डितः | सभापंडितः | सभा में पंडित |
| प्रेमिण धूर्त्तः | प्रेमधूर्तः | प्रेम में धूर्त |
| कर्मणि कुशलः | कर्मकुशलः | कर्म में कुशल |
| दाने वीरः | दानवीरः | दान में वीर |
| व्याकरणे पटुः | व्याकरणपटुः | व्याकरण में निपुण |
| कलायां कुशलः | कलाकुशलः | कला में कुशल |
| व्यवहारे चपलः | व्यवहारचपलः | व्यवहार में चपल |
| काव्ये प्रवीणः | काव्य प्रवीणः | काव्य में प्रवीण |
| रणे पंडितः | रणपंडितः | रण में पंडित |
सप्तम्यन्त सुबन्त का ‘सिद्ध” आदि शब्दों के साथ समास होता है। जैसे-
| समास-विग्रह | समस्तपद | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| मंत्रे सिद्धः | मंत्रसिद्धः | मंत्र में सिद्ध |
| आतपे शुष्कः | आतपशुष्कः | धूप में सूखा हुआ |
| चक्रे बन्धः | चक्रबन्धः | चक्र में बँधा हुआ |
| घृते पक्वः : | घृतपक्वः | घी में पका हुआ |
