रामधारी सिंह “दिनकर” राष्ट्रीय जीवन की आकांक्षाओं के उत्कृष्ट प्रतिनिधि कवि हैं। इनकी कविताओं में विद्रोह, राष्ट्र-प्रेम, अन्याय तथा शोषण के प्रति आवाज उठी है। राष्ट्रकवि का सम्मान देकर राष्ट्र ने उनके प्रति कृतज्ञता का परिचय दिया है। दिनकर की कविता युगीन समस्याओं को प्रस्तुत करती है। वे “ओज” और “माधुर्य” के कवि के रूप में हिन्दी को अनेक काव्य रचनाएँ दे चुके हैं। क्रान्तिवीर दिनकर की कविताएँ मन को झकझोर देने में समर्थ हैं। उनके कृतित्व की श्रेष्ठता का प्रमाण है उनकी कृति “उर्वशी” पर मिला “ज्ञानपीठ” पुरस्कार। दिनकर जी सच्चे अर्थों में राष्ट्र कवि कहे जाने योग्य हैं।
रामधारी सिंह “दिनकर” का जीवन परिचय
रामधारी सिंह “दिनकर” का जन्म बिहार के मुंगेर जिले में सिमरिया गाँव में 30 सितम्बर, सन् 1908 ई. को हुआ था। इनके पिता का नाम रविसिंह एवं माता का नाम मनरूपदेवी था। बाल्यावस्था में ही इनके पिता का देहान्त हो जाने के कारण इनकी माताजी ने इनका पालन किया। मोकामघाट से हाईस्कूल करके पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। मोकामघाट के विद्यालय में प्रधानाचार्य में पद पर कार्य किया और फिर उसके बाद सब-रजिस्टार के पद पर भी कार्य किया। ये मुजफ्फरपर कॉलेज के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी रहे। तत्पश्चात् वे भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार पद पर भी कार्य किया। अनेक वर्षों तक ये राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। 24 अप्रैल, सन 1974 को इनका देहान्त हो गया।
“दिनकर” प्रारम्भ से ही लोक के प्रति निष्ठावान सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सजग और जनसाधारण के प्रति समर्पित कवि रहे हैं। सरकारी सेवा में रहते हए भी इन्होंने स्वदेश-प्रेम की रचनाएँ की। “उर्वशी” महाकाव्य पर इनको १९७२ ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने इनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए इन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया।
रचनाएँ
रामधारी सिंह दिनकर जी ने काव्य और गद्य दोनों ही क्षेत्रों में साहित्य का सृजन किया है-
काव्य रचनाएँ
“रेणुका”, “हुंकार”, “रसवन्ती”, “बन्द्र-गीत”, “सामधेनी”, “कुरुक्षेत्र”, “रश्मिरथी”, “उर्वशी”, “परशुराम की प्रतीक्षा”, “नीम के पत्ते”, “नील कुसुम”, “चक्रवाल”, “बापू”, “इतिहास के आँसू”, “सीपी और शंख”, “नए सुभाषित”, “आत्मा की आँखें, “हारे को हरि नाम” आदि।
इनकी कविता का चरमोत्कर्ष “उर्वशी” में दृष्टिगोचर होता है। इसमें पुरुरवा सनातन नर के प्रतीक हैं और उर्वशी सनातन नारी की और इनके माध्यम से दिनकर ने पुरुषार्थ चतुष्टय में मोक्ष-प्राप्ति के विधान को बताया है।
“रश्मिरथी” प्रबन्ध काव्य है, जिसमें महाभारत के उपेक्षित पात्र कर्ण का पुनर्मूल्यांकन किया और उसे गरिमामय पात्र के रूप में अंकित किया है।
दिनकर ने “संस्कृति के चार अध्याय” के रूप में एक श्रेष्ठ गद्य रचना लिखी है।
“दिनकर की डायरी” भी एक उच्चकोटि की रचना है।
इनके अतिरिक्त भी दिनकर की अनेक गद्य रचनाओं में उनका गम्भीर चिन्तन एवं अध्ययन-मनन व्यक्त हुआ है।
हिन्दी साहित्य में स्थान
रामधारी सिंह दिनकर आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाएँ उच्चकोटि की हैं जो सहृदय एवं विचारशील पाठकों की हृदय एवं बद्धि को तृप्त करती हैं। उनकी भाषा में ओज है एवं भावों में रसानभति कराने की क्षमता है। वे क्रान्तिदर्शी कवि है तथा मानव मूल्यों के समर्थक हैं। निश्चय ही इस राष्ट्रकवि के प्रदेय पर हिन्दी गर्व कर सकती है।
Q. “अभिनव मनुष्य” नामक कविता के कथ्य एवं शिल्प पर प्रकाश डालिए। अथवा “अभिनव मनुष्य” की उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए। अथवा “अभिनव मनुष्य” के काव्य सौष्ठव पर सोदाहरण विचार व्यक्त कीजिए। अथवा “अभिनव मनुष्य” के संदेश को व्यक्त कीजिए।
“अभिनव मनुष्य” राष्ट्रकवि रामधारी सिंह द्वारा रचित “कुरुक्षेत्र” नामक काव्य ग्रन्थ के अन्तिम सर्ग में संकलित है। कवि का विचार है कि मनुष्य ने भौतिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में तो पर्याप्त प्रगति कर ली है किन्तु उसकी आध्यात्मिक प्रगति अवरुद्ध हो गई है। जब तक बुद्धि पर हृदय अर्थात् भावना की जीत नहीं होती, जब तक वह मानवीय मूल्यों का सम्मान करना नहीं सीखता तब तक उसकी सारी प्रगति व्यर्थ है। इस कविता के सार को निम्न शीर्षकों में व्यक्त किया जा सकता है –
भोगलिप्सु मानव
मानव की भोग लिप्सा असीमित है। भले ही आज मानव ने सुख-सुविधा के असीमित साधन जुटा लिए हों किन्तु उसकी भोगलिप्सा समाप्त नहीं हुई है। कवि इसी विषय में कहता है-
पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार।
भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम।
बह रही असहाय नर की भावना निष्काम।।”
प्रकृति पर विजय
आज के मानव ने प्रकृति पर विजय पा ली है। उसने असीमित शक्ति पा ली है। मानव के हाथों में आज विद्यत, वाष्प और जल की शक्ति आ गई है। वायु के ताप को अपनी इच्छा से वह शीत या उष्ण कर सकता है। नदी, सागर, पर्वत अब उसके लिए अवरोध नहीं रहे। वह इन्हें आसानी से पार कर सकता है। प्रकृति के तत्व उसकी आज्ञा को मानकर तद्नुसार आचरण करते हैं। सागर की शक्ति उसके नियन्त्रण में है-
प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन।।
हैं बँधे नर के करों में वारि विद्युत भाप।
हुक्म पर चढ़ता उतरता है पवन का ताप।।
विज्ञान एक अभिशाप
कवि का मत है कि विज्ञान मानव जाति के लिए अभिशाप है जिसने परमाणु बम जैसे विनाशक अस्त्र बनाए हैं। इससे सम्पूर्ण मानवता के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। यदि विज्ञान तलवार है, तो उसकी तीखी धार से तेरे ही अंग कटने का भय है अतः तू इसे त्याग दे, इसी में मानव जाति का हित है।
तो इसे दे फेंक तजकर मोह स्मृति के पार।।
खेल सकता तूँ नहीं ले हाथ में तलवा।।
काट लेगा अंग तीखी है बड़ी यह धार।।
बुद्धि पर हृदय की विजय की कामना
दिनकर जी की कामना है कि मनुष्य की बुद्धि पर हृदय की विजय हो, तभी मानवता का कल्याण हो सकेगा। जब तक मनुष्य बुद्धि को हृदय या भावना पर वरीयता देता रहेगा तब तक मानव का कल्याण नहीं हो सकता। मानव का वास्तविक परिचय यही है कि वह एक भावनात्मक प्राणी है। प्रत्येक मानव दूसरे मानव के प्रति प्रेम और भाईचारे की भावना रखे तभी मानवता का कल्याण हो सकेगा। कवि दिनकर के शब्दों में-
श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीत।।
एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान।
तोड़ दे जो बस वही ज्ञानी वही विद्वान।।
कवि ने विज्ञान के विध्वंसक रूप की निन्दा की है इसलिए वह अभिनव मानव को सचेत करता है कि तू इस विज्ञान रूपी तलवार को फेंक दे तथा परस्पर शान्ति, सौहार्द एवं भाईचारे की भावना विकसित कर।
शिल्प सौन्दर्य
इस कविता का शिल्प भी उच्चकोटि का है। कवि ने लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग यहाँ किया है। विज्ञान को तलवार कहने का लाक्षणिक अर्थ है कि विज्ञान ने विध्वंसक आविष्कार किए हैं जो मानव जाति का विनाश कर सकते हैं।
कविता में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग कवि ने किया है। सम्पूर्ण कविता में ओज गुण की प्रधानता है। साहित्यिक परिनिष्ठित हिन्दी में रचित इस कविता में संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग कवि ने किया है।
उक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि “अभिनव मनुष्य” नामक कविता में लेखक ने एक ओर तो मानव को सावधान किया है तो दूसरी ओर उसे “भावना” को वरीयता देने तथा कोरे बुद्धिवाद को त्यागने के लिए कहा है। मानव को विवेक का सहारा लेना चाहिए तभी मानवता का विध्वंस रोका जा सकेगा। वैज्ञानिक आविष्कार उसे विनाश की ओर ले जा सकते हैं अतः कवि उसे सचेत करना चाहता है। मानव को संवेदनशील बनना चाहिए तभी वह अपने अन्दर मानवीय गुणों का विकास कर सकेगा और तभी मानवता का कल्याण हो सकेगा।
Q. दिनकर के काव्य में अभिव्यक्त राष्ट्रीय भावना पर प्रकाश डालिए। अथवा दिनकर के काव्य में विद्रोह, मानवतावाद एवं राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति हुई है। स्पष्ट कीजिए।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर मूलतः ओज एवं औदात्य के कवि हैं। उनकी रचनाओं में देशप्रेम एवं राष्ट्रीयता की भावनाओं के साथ-साथ क्रांति के स्वर एवं मानवतावाद भी उपलब्ध होता है। वस्तुतः वे उन देशभक्त कवियों की पंक्ति में विराजमान हैं जिसमें मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आदि राष्ट्रभक्त कवि विराजते हैं।
रामधारी सिंह दिनकर जी की रचनाओं-रेणुका, हुंकार, सामधेनी, परशुराम की प्रतीक्षा, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, आदि में राष्टीय भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। दिनकर-काव्य की प्रमुख उपलब्धियों को निम्न शीर्षकों में प्रस्तुत किया जा सकता है –
देशप्रेम एवं राष्ट्रीयता
दिनकर जी के काव्य में देश-प्रेम एवं राष्ट्रीयता की भावना प्रमुख रूप से विद्यमान है। वस्तुतः वे युगीन चेतना से अनुप्राणित होकर ऐसा काव्य लिख रहे थे जो स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़ने के लिए युवकों को प्रेरित कर सके। हिमालय नामक कविता में वे भारतीयों को जाग्रत करने का प्रयास करते हुए कहते हैं :
तू शैलराट हुंकार भरे, फट जाय कुहा भागे प्रमाद।।
शोषण का विरोध
दिनकर जी के काव्य में प्रगतिशील चेतना कई रूपों में दिखाई पड़ती है। वे अन्याय और अत्याचार के विरोधी हैं। शोषण का विरोध उनकी कविता का प्रमुख स्वर है। एक ओर तो पूंजीपति अपने कुत्तों की देखभाल पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं तो दूसरी ओर गरीब को जीवन यापन की सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं। विषमता का यह चित्रण कवि ने निम्न पंक्तियों में किया है :
माँ की छाती से चिपक ठिठुर, जाड़े की रात बिताते हैं।।
मानवतावाद
रामधारी सिंह दिनकर जी की कविता में मानवतावाद एवं मानवीय मूल्यों को विशेष महत्व दिया गया है। वे युद्ध को घृणित कर्म मानते हैं, अहिंसा का भी समर्थन करते हैं, किन्तु साथ ही यह भी चाहते हैं कि कोई किसी के अधिकारों को हनन न करे। क्षमा वीरों का आभूषण है, कायरों की ढाल नहीं। जिसमें दण्ड देने की सामर्थ्य है वही क्षमा कर सकता है:
उसको क्या जो दन्तहीन विषहीन विनीत सरल हो।
“अभिनव मनुष्य” में वे मानव को सावधान करते हैं कि तू विज्ञान द्वारा आविष्कृत इन विनाशक अस्त्रों से मत खेल। ये मानवता के लिए विनाशकारी सिद्ध होंगे :
तो इसे दे फेंक तजकर मोह, स्मृति के पार।
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार।
काट लेगा अंग तीखी है बड़ी यह धार।।
क्रान्ति के समर्थक
दिनकर जी के काव्य में विद्रोह एवं क्रान्ति के स्वर भी सुनाई पड़ते हैं। वे अन्याय का विरोध करते हैं और अत्याचार को समाप्त करने के लिए क्रान्ति का बिगुल बजाते हैं। यदि अधिकार माँगने से न मिलें तो उसके लिए जीवन की बाजी लगाकर युद्ध करना पाप नहीं है। वे कहते हैं :
धर्मराज बोलो वे शोषित जियें या कि मर जाएँ?
रामधारी सिंह दिनकर जी का कथन है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं होता अपितु वह घरों, कारखानों एवं बाजारों में भी लड़ा जाता है। सभी जगह मोर्चे खुले हए हैं अतः आलस्य को त्याग देना चाहिए। वे कहते हैं-
खेतों में खलियान, बैठकों बाजारों में
जहाँ कहीं आलस्य वहीं दुर्भाग्य देश का।
उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि “रामधारी सिंह दिनकर” के काव्य में वीरता एवं राष्ट्रीयता के स्वर विद्यमान हैं। उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी में जनजागरण का प्रयास करके कवि कर्तव्य का सही अर्थों में पालन किया है। वे जन-जन में कर्मण्यता, शूरता एवं पराक्रम के भाव भर देना चाहते हैं। वे वास्तविक अर्थ में राष्ट्रचेतना को जाग्रत एवं मुखरित करने वाले राष्ट्रकवि हैं।
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