विविध समायोजन/रक्षातन्त्र कवच या रक्षा युक्ति
कोलमैन, 1976 (Coleman, 1976) के अनुसार- “यह व्यक्तियों की प्रतिक्रिया के वह विचार हैं, जिनसे व्यक्ति में उपयुक्तता की भावना बनी रहती है तथा इनकी सहायता से व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से दबावपूर्ण परिस्थितियों से सामना करता है, बहुधा परिक्रियाएँ चेतन तथा वास्तविकता को विकृत करने वाली होती हैं।”
जे. एफ. ब्राउन (J.E. Brown, 1940) के अनसार- “मनोरचनाएँ वह चेतन तथा अचेतन प्रक्रियाएँ हैं, जिनमें आन्तरिक संघर्ष कम होता है अथवा समाप्त हो जाता है।”
रक्षा युक्तियों के प्रकार
मनोरचनाएँ या रक्षा युक्तियाँ प्रमुख रूप से 10 प्रकार की होती हैं-
1. उदात्तीकरण (Sublimation)
व्यक्ति के अन्तर्द्वन्द्व के समाधान में इस मनोरचना का प्रमुख स्थान है। इस मनोरचना को इस प्रकार भी स्पष्ट किया जा सकता है कि कामशक्ति की प्रवृत्तियों या प्रेरकों का नैतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक विषयों की ओर पुनः निर्देशन की क्रिया ही उदात्तीकरण कहलाती है। इसके द्वारा व्यक्ति अपनी अनैतिक प्रेरणाओं की सन्तुष्टि समाज के स्वीकृत उद्देश्यों के अनुसार करता है।
कॉलमैन के अनुसार उदात्तीकरण कुण्ठित लैंगिक शक्ति का वह साधन है, जिसके द्वारा यह शक्ति आंशिक रूप से प्रतिस्थापित क्रियाओं में परिवर्तित हो जाती है। यह एक प्रकार का Redirection है। इस मनोरचना से सम्बन्धित व्यवहार समाज द्वारा मान्य नहीं होता है। अचेतन अन्तर्द्वन्द्व का समाधान रचनात्मक कार्यों के द्वारा होता है। संक्षेप में इसे “Flight to creative world” भी कहा जा सकता है।
2. दमन (Repression)
दमन की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप विभिन्न दुःखद तथा भयावह विचार एवं इच्छाएँ व्यक्ति की जानकारी के बिना उसके चेतन से हटकर अचेतन में चली जाती हैं। कॉलमैन, 1976 के अनुसार- “दमन वह मनोरचना है, जिसके द्वारा घातक इच्छाएँ, असहनीय स्मृतियाँ आदि चेतना से अलग कर दी जाती हैं।”
By which dangerous desires and into lebrable memories are kept out of consciousness.
दमन शब्द का उपयोग सबसे पहले फ्रॉयड ने किया था। उसके अनुसार दु:खद, अप्रिय एवं कष्टकारी इच्छाएँ और स्मृतियाँ चेतन से स्वतः अथवा बिना प्रयास के ही बहिष्कृत हो जाती हैं। यही दमित सामग्री व्यक्ति की स्थायी विस्मृति हो जाती है। यह सामग्री अचेतन मन में पहुंचती है।
ब्राउन ने दमन का एक अन्य उदाहरण दिया है – एक लड़की के पिता बीमार थे। परिवार में पिता तथा पुत्री दो ही सदस्य थे। लड़की नौकरी करके घर का खर्च चलाती थी तथा पिता का उपचार कराती थी। पिता के उपचार के लिये एक डॉक्टर आता था। एक दिन पिता की हालत खराब थी। बीमार पिता के समीप डॉक्टर एवं पुत्री दोनों उपस्थित थे। डॉक्टर को देखकर लड़की के मन में काम इच्छा जाग्रत हुई, परन्तु बीमार पिता के उत्तरदायित्व के कारण यह इच्छा कुछ ही समय में उसके मन से स्वतः ही हट गयी।
3. शमन (Suppression)
शमन वह मानसिक मनोरचना है, जिसके द्वारा व्यक्ति अप्रिय, दु:खद तथा कष्टकारी घटनाओं, इच्छाओं और विचारों को चेतना से जानबूझ कर निकाल देता है; उदाहरणार्थ– प्रात:काल पेपर वाले से झडप हो गयी तो मन को बड़ा बुरा लगा, परंतु यह सोचकर इस बात को मन से निकाल दिया कि जो हुआ, सो हुआ और अन्य किसी कार्य में अपने दिमाग को लगा दिया।
4. प्रतिगमन (Regression)
कोलमैन के अनुसार Ego को बनाये रखने के लिये तथा दबावपूर्ण परिस्थितियों को दूर करने के लिये जब व्यक्ति कम परिपक्व प्रतिउत्तरों की सहायता लेता है तो वह प्रक्रिया प्रतिगमन कहलाती है। इस मनोरचना में व्यक्ति अपने से कम उम्र के व्यक्तियों का व्यवहार अपनाता है; उदाहरणार्थ– विवाहित व्यक्ति का अपनी पत्नी से झगड़े के पश्चात् फूट-फूटकर रोना, क्रोध में तोड़-फोड़ करना या बालकों की तरह चीखना-चिल्लाना आदि।
5. औचित्यस्थापना (Rationalization)
इस मनोरचना में व्यक्ति अपनी बात को उचित ठहराने के लिये झूठे कारण तथा प्रक्रियाएँ देता है; उदाहरणार्थ– पास न होने की स्थिति में शिक्षक पर न पढ़ाने का अरोप लगाना या रट-रटकर पास न होने का औचित्य देना।
कॉलमैन (1974) के अनुसार- “इस मनोरचना में व्यक्ति जो कर चुका है या करने वाला है, उस दृष्कृत्य के सम्बन्ध में अच्छे तर्क देकर उसे उपयुक्त ठहराने का प्रयास करता है।”
6. प्रक्षेपण (Projection)
इस मनोरचना के द्वारा व्यक्ति दोषों तथा कमियों को दूसरों पर आरोपित करके सुख का अनुभव करता है। इस प्रकार की प्रबल प्रवृत्ति प्रायः ऐसे व्यक्तियों में देखने में आती है, जिनमें परम अहं का विकास अत्यधिक कठोर होता है। इस प्रकार के व्यक्ति अपनी अनैतिक तथा कामुक इच्छाओं को स्वयं स्वीकार न करके उनको दूसरे व्यक्तियों पर आरोपित कर देते हैं।
पेज के अनुसार- “अपनी भावनाओं तथा लक्षणों को दूसरों में देखना या दूसरों पर अरोपित करना ही प्रक्षेपण है।”
कॉलमैन के अनुसार- “प्रक्षेपण वह मनोरचना है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी कठिनाइयों का दोषारोपण दूसरों पर करता है।”
इस मनोरचना के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि इस मनोरचना का प्रयोग व्यक्ति चेतन और अचेतन दोनों स्तरों पर करता है। इससे व्यक्ति अपने अन्तर्द्वन्द्व का समाधान अपने अहं के गणों को वातावरण के किसी अन्य व्यक्ति पर अरोपित करके करता है।
प्रक्षेपण के कुछ उदाहरण निम्न हैं-
- पढ़ायी से जी चुराने वाला एक छात्र कक्षा में फेल होने पर यह कहे कि परीक्षण ठीक नहीं है।
- टेनिस खेल में हारने वाला खिलाड़ी जो कि नशेबाज है, कहे कि गेंद अच्छी नहीं थी।
- भ्रष्टाचारी राजनीतिज्ञ यह कहे कि भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तथा व्यक्ति अपनी नैतिक तथा धार्मिक मान्यताओं का निरादर कर रहा है।
7. अन्तःक्षेपण (Introjection)
जब व्यक्ति वातावरण के गुणों को अपने व्यक्तित्व में सम्मिलित कर लेता है तब व्यक्ति की वह प्रवृत्ति अन्तःक्षेपण प्रवृत्ति कही जाती है; उदाहरणार्थ– किसी दूसरे के दुःख में दु:खी होकर उसके जैसा अनुभव करना या यह कहना कि मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ।
8. आत्मीकरण (Identification)
इस मनोरचना में व्यक्ति किसी दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर स्वयं को उसके व्यक्तित्व में ढालने का प्रयास करता है।
ब्राउन (1940) के अनुसार, इसमें व्यक्ति अपनी Ego या व्यक्तित्व को दूसरे के व्यक्तित्व-साँचे में ढालने का प्रयत्न करता है या दूसरों के व्यक्तित्व को अपना समझने लगता है।
इस मनोरचना में व्यक्ति अपने व्यवहार, अपनी क्रियाओं अथवा अपने आपको किसी अन्य व्यक्ति के अनुसार बनाने का प्रयास करता है या बना लेता है।
दूसरे शब्दों में, यह भी कहा जा सकता है कि जब हम किसी व्यक्ति की वेशभूषा की नकल करते हैं, उसके बोलने के ढंग या हेयर स्टाइल की नकल करके उसके समान अपने आपको समझने लगते हैं तो यह आत्मीकरण है। बहुधा किशोर-किशोरियाँ, अभिनेता तथा अभिनेत्रियों से अपने आपको Identify करते हैं।
9. विस्थापन (Displacement)
विस्थापन मनोरचना में व्यक्ति अपने संवेग, विचार एवं इच्छाओं को उन व्यक्तियों या पदार्थों, जिनमें वह मौखिक रूप से सम्बन्धित होते हैं, से हटकर अन्य व्यक्तियों अथवा पदार्थों पर स्थानान्तरित कर देता है।
कॉलमैन (1976) के अनुसार- “विस्थापन में किसी व्यक्ति या वस्तु से सम्बन्धित संवेग या प्रतीकात्मक अर्थ हटकर दूसरे व्यक्ति या वस्तु पर परिवर्तित हो जाते हैं।”
पेज (1962) के अनुसार- “विस्थापन वह मनोरचना है, जिसके द्वारा किसी विचार या वस्तु से सम्बन्धित संवेग किसी अन्य विचार या वस्तु पर स्थानान्तरित हो जाते हैं; उदाहरण के लिये-यदि कोई पति अपनी पत्नी पर क्रोधित हो, परन्तु अपना क्रोध उस पर व्यक्त न कर पाये और उसे अपने कुत्ते पर व्यक्त करे तो वह विस्थापन का उदाहरण है।”
10. क्षतिपूर्ति (Compensation)
इस मनोरचना के अनुसार अवांछनीय लक्षण को व्यक्ति वांछनीय लक्षण के बढ़े हुए रूप द्वारा बदल देता है। इस मनोरचना के द्वारा व्यक्ति अपनी हीनता तथा अनुपयुक्तता के लक्षणों से अपनी सुरक्षा करता है; उदाहरणार्थ– एक कम सुन्दर लड़की अपने व्यवहार को मधुर बना ले। एक प्रेम में असफल व्यक्ति कवि या संगीतकार बन जाय।
मनोरचना या रक्षा युक्तियों को प्रभावित करने वाले कारक
Factors Effecting to Defence Mechanisms
मनोरचना या रक्षा युक्तियों को प्रभावित करने वाले कारक निम्न हैं-
1. असफलता (Failure)
व्यक्ति असफलता के कारण मनोरचना का सहारा लेता है। असफल व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का बचाव इस सुरक्षा तन्त्र से करता है।
2. हीनता से बचाव (Prevention from inferiority)
दूसरों की दृष्टि में अपने व्यक्ति को उच्च प्रदर्शित करने के लिये तथा हीनता से बचाव के लिये व्यक्ति मनोरचना का सहारा लेता है।
3. आत्मग्लानि से बचाव (Defence from guilty feeling)
अनेक बार व्यक्ति अपनी असफलता से स्वयं के Ego को बचाने के लिये अनेक प्रकार के बहाने गढ़ता है और मनोरचना के द्वारा अपना आत्मग्लानि से बचाव करता है।
4. अहं (Ego)
अहं के कारण भी व्यक्ति मनोरचना का सहारा लेता है। व्यक्ति अपने आपको किसी से कमतर, छोटा, हीन या निर्बल नहीं आँकना चाहता; जैसे-टी.बी. का मरीज कहे कि मैं गामा पहलवान की हड्डी तुरन्त तोड़ दूंगा।
5. कुण्ठा (Frustration)
कुण्ठा भी मनोरचना को प्रभावित करने वाला एक कारक है। कुण्ठित व्यक्ति अपनी कुण्ठा से बचने के लिये मनोरचना का सहारा लेता है।
6. चिन्ता (Anxiety)
व्यक्ति अपनी चिन्ताओं को नहीं बढ़ाना चाहता। वह विभित्र बहानों द्वारा अपने अहं को सन्तुष्ट करना चाहता है।
7. आकांक्षाएं (Desires)
प्रत्येक व्यक्ति की यह आकांक्षा होती है कि समाज में उसकी स्थिति उच्च हो। किसी भी कार्य में व्यक्ति असफल नहीं होना चाहता। इसलिये व्यक्ति मनोरचना का सहारा लेता है।
