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in हिन्दी व्याकरण
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कुंडलिया दोहा और रोला के संयोग से बना छंद है। इस छंद के ६ चरण होते हैं तथा प्रत्येकचरण में २४ मात्राएँ होती है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कुंडलिया के पहले दो चरण दोहा तथा शेष चार चरण रोला से बने होते है।

दोहा के प्रथम एवं तृतीय चरण में १३-१३ मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं।

रोला के प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती है। यति ११वीं मात्रा तथा पादान्त पर होती है। कुंडलिया छंद में दूसरे चरण का उत्तरार्ध तीसरे चरण का पूर्वार्ध होता है।

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परिभाषा   

   कुण्डलिया मात्रिक छंद है। एक दोहा तथा दो रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। दोहे का अंतिम चरण ही प्रथम रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होती है।

उदाहरण 

(1)

बेटे-बेटी में करो, समता का व्यवहार।

 बेटी ही संसार की, होती सिरजनहार।।

होती सिरजनहार, स्रजन को सदा सँवारा।

जिसने ममता को उर में जीवन भर धारा।।

कह 'मयंक' दामन में कँटक रही समेटे।

बेटी माता बनकर जनती बेटी-बेटे।।

(2)

हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर।

 उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।।

सबको करें विभोर, प्रदूषण हर लेते हैं।

कंकड़-पत्थर खाकर, मीठे फल देते हैं।।

कह 'मयंक' आचरण, विचार साफ-सुथरे हों। 

उपवन के सारे, पादप नित हरे-भरे हों।।   

मात्राओं की गिनती कैसे करें-

काव्य में छंद का अपना महत्व है। छंद रचना के लिए मात्राओं को समझना एवं मात्राओं कि गिनती करने का ज्ञान होना आवश्यक है। यह सर्वविदित है कि वर्णों को स्वर एवं व्यंजन में विभक्त किया गया है। स्वरों की मात्राओं की गिनती करने का नियम निम्नवत है-

अ, इ, उ की मात्राएँ लघु (।) मानी गयी हैं।

आ, ई, ऊ, ए, ऐ ओ और औ की मात्राएँ दीर्घ (S) मानी गयी है।

क से लेकर ज्ञ तक व्यंजनों को लघु मानते हुए इनकी मात्रा एक (।) मानी गयी है। इ एवं उ की मात्रा लगने पर भी इनकी मात्रा लघु (1) ही रहती है, परन्तु इन व्यंजनों पर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ की मात्राएँ लगने पर इनकी मात्रा दीर्घ (S) हो जाती है।

अनुस्वार (.) तथा स्वरहीन व्यंजन अर्थात आधे व्यंजन की आधी मात्रा मानी जाती है।सामान्यतः आधी मात्रा की गणना नहीं की जाती परन्तु यदि अनुस्वार (।) अ, इ, उ अथवा किसी व्यंजन के ऊपर प्रयोग किया जाता है तो मात्राओं की गिनती करते समय दीर्घ मात्रा मानी जाती है किन्तु स्वरों की मात्रा का प्रयोग होने पर अनुस्वार (.) की मात्रा की कोई गिनती नहीं की जाती।

स्वरहीन व्यंजन से पूर्व लघु स्वर या लघुमात्रिक व्यंजन का प्रयोग होने पर स्वरहीन व्यंजन से पूर्ववर्ती अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती है। उदाहरण के लिए अंश, हंस, वंश, कंस में अं हं, वं, कं सभी की दो मात्राए गिनी जायेंगी। अच्छा, रम्भा, कुत्ता, दिल्ली इत्यादि की मात्राओं की गिनती करते समय अ, र, क तथा दि की दो मात्राएँ गिनी जाएँगी, किसी भी स्तिथि में च्छा, म्भा, त्ता और ल्ली की तीन मात्राये नहीं गिनी जाएँगी। इसी प्रकार त्याग, म्लान, प्राण आदि शब्दों में त्या, म्ला, प्रा में स्वरहीन व्यंजन होने के कारण इनकी मात्राएँ दो ही मानी जायेंगी।

अनुनासिक की मात्रा की कोई गिनती नहीं की जाती. जैसे-
हँस, विहँस, हँसना, आँख, पाँखी, चाँदी आदि शब्दों में अनुनासिक का प्रयोग होने के कारण इनकी कोई मात्रा नहीं मानी जाती।

अनुनासिक के लिए सामान्यतः चन्द्र -बिंदु का प्रयोग किया जाता है. जैसे -
साँस, किन्तु ऊपर की मात्रा वाले शब्दों में केवल बिंदु का प्रयोग किया जाता है, जिसे भ्रमवश कई पाठक अनुस्वार समझ लेते है.जैसे- पिंजरा, नींद, तोंद आदि शब्दों में अनुस्वार ( . ) नहीं बल्कि अनुनासिक का प्रयोग है।

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कुण्डलिया छंद की परिभाषा

कुण्डलिया एक मात्रिक छंद है। इसका निर्माण एक दोहे और दो रोला छंदों को मिलाकर होता है। दोहे का अंतिम चरण, पहले रोले का पहला चरण होता है। कुण्डलिया जिस शब्द से शुरू होती है, उसी शब्द से उसका अंत भी होता है।

कुण्डलिया छंद के उदाहरण

उदाहरण 1

बेटे-बेटी में करो, समता का व्यवहार।

बेटी ही संसार की, होती सिरजनहार।।

होती सिरजनहार, सृजन को सदा सँवारा।

जिसने ममता को उर में जीवन भर धारा।।

कह 'मयंक' दामन में कंटक रही समेटे।

बेटी माता बनकर जनती बेटी-बेटे।।

उदाहरण 2

हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर।

उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।।

सबको करें विभोर, प्रदूषण हर लेते हैं।

कंकड़-पत्थर खाकर, मीठे फल देते हैं।।

कह 'मयंक' आचरण, विचार साफ-सुथरे हों।

उपवन के सारे, पादप नित हरे-भरे हों।।

मात्राओं की गिनती कैसे करें?

काव्य में छंद का विशेष महत्व है। छंद लिखने के लिए मात्राओं का ज्ञान और उनकी सही गिनती करना आवश्यक है। हिंदी वर्णमाला में वर्णों को मुख्य रूप से स्वर और व्यंजन में बाँटा जाता है। मात्राओं की गणना करते समय निम्नलिखित नियमों का ध्यान रखना चाहिए।

1. लघु और दीर्घ स्वर की मात्राएँ

  • लघु स्वर: अ, इ और उ की मात्रा एक मानी जाती है।

  • दीर्घ स्वर: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ की मात्रा दो मानी जाती है।

2. व्यंजनों की मात्राएँ

सामान्यतः बिना स्वर चिह्न वाले व्यंजन में एक मात्रा मानी जाती है। इ और उ जैसे लघु स्वरों की मात्रा जुड़ने पर भी अक्षर की कुल मात्रा एक रहती है। आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ जैसे दीर्घ स्वरों के जुड़ने पर अक्षर की मात्रा दो हो जाती है।

3. अनुस्वार और आधे व्यंजन की मात्रा

अनुस्वार और स्वरहीन व्यंजन की गणना छंद के नियमों के अनुसार की जाती है। जब किसी लघु स्वर के बाद अनुस्वार या संयुक्त व्यंजन के कारण अक्षर गुरु हो जाता है, तो उसकी गिनती दो मात्राओं के रूप में की जाती है।

उदाहरण के लिए, अंश, हंस, वंश और कंस जैसे शब्दों में संबंधित अक्षरों की मात्रा गिनते समय उच्चारण और छंद के नियमों का ध्यान रखा जाता है।

इसी प्रकार अच्छा, रम्भा, कुत्ता और दिल्ली जैसे शब्दों में संयुक्त व्यंजन या आधे व्यंजन के कारण पहले आने वाले लघु स्वर की गणना प्रभावित हो सकती है। इसलिए मात्रा गिनते समय केवल लिखावट नहीं, बल्कि उच्चारण और छंद के नियम भी देखने चाहिए।

4. संयुक्त व्यंजन वाले शब्दों की मात्रा

त्याग, म्लान और प्राण जैसे शब्दों में संयुक्त व्यंजन का प्रयोग होता है। इन शब्दों की मात्रा गिनते समय स्वर की लंबाई और अक्षर की बनावट को ध्यान में रखना चाहिए।

5. अनुनासिक की मात्रा

अनुनासिक ध्वनि को सामान्यतः चंद्रबिंदु (ँ) से दर्शाया जाता है। केवल चंद्रबिंदु के कारण अलग से कोई मात्रा नहीं जोड़ी जाती।

उदाहरण:

हँस, विहँस, हँसना, आँख, पाँखी और चाँदी।

6. चंद्रबिंदु और बिंदु का प्रयोग

हिंदी में चंद्रबिंदु (ँ) और बिंदु (ं) का प्रयोग अलग-अलग ध्वनियों को दर्शाने के लिए किया जाता है। कुछ शब्दों में मात्रा के ऊपर बिंदु दिखाई देता है, लेकिन उसका सही अर्थ समझने के लिए शब्द की वर्तनी और उच्चारण पर ध्यान देना आवश्यक है।

उदाहरण के लिए, साँस शब्द में चंद्रबिंदु का प्रयोग होता है, जबकि पिंजरा, नींद और तोंद जैसे शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है।

निष्कर्ष

कुण्डलिया छंद को समझने के लिए उसकी रचना, दोहा और रोला के संयोजन तथा मात्रा-गणना के नियमों का ज्ञान आवश्यक है। लघु और दीर्घ स्वरों, संयुक्त व्यंजनों और नासिक्य ध्वनियों को सही ढंग से समझकर छंद की मात्राओं की गणना अधिक सटीकता से की जा सकती है।

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