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Deva yadav

परिभाषा   

   कुण्डलिया मात्रिक छंद है। एक दोहा तथा दो रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। दोहे का अंतिम चरण ही प्रथम रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होती है।

उदाहरण 

(1)

बेटे-बेटी में करो, समता का व्यवहार।

 बेटी ही संसार की, होती सिरजनहार।।

होती सिरजनहार, स्रजन को सदा सँवारा।

जिसने ममता को उर में जीवन भर धारा।।

कह 'मयंक' दामन में कँटक रही समेटे।

बेटी माता बनकर जनती बेटी-बेटे।।

(2)

हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर।

 उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।।

सबको करें विभोर, प्रदूषण हर लेते हैं।

कंकड़-पत्थर खाकर, मीठे फल देते हैं।।

कह 'मयंक' आचरण, विचार साफ-सुथरे हों। 

उपवन के सारे, पादप नित हरे-भरे हों।।   

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