छायावादी युग का साहित्य (1918 – 1936 ई०) अनेक अमूल्य रचनाओं का सागर है, इतना समृद्ध साहित्य किसी भी दूसरी भाषा का नहीं है और न ही किसी अन्य भाषा की परम्परा का साहित्य एवं रचनाएँ अविच्छिन्न प्रवाह के रूप में इतने दीर्घ काल तक रहने पाई है।
छायावादी युग के कवि और उनकी रचनाएँ को दो भागों में विभक्त किया गया है- छायावादी काव्य धारा और राष्ट्रवादी सांस्कृतिक काव्य धारा। दोनों प्रकार के छायावादी कवि और उनकी रचनाएँ नीचे दी हुई हैं-
छायावादी काव्य धारा के कवि और उनकी रचनाएँ
| क्रम | रचनाकार | छायावादी काव्य धारा की रचना |
|---|---|---|
| 1. | जयशंकर प्रसाद | उर्वशी, वनमिलन, प्रेमराज्य, अयोध्या का उद्धार, शोकोच्छवास, बभ्रुवाहन, कानन कुसुम, प्रेम पथिक, करुणालय, महाराणा का महत्व; झरना, आँसू, लहर, कामायनी (केवल झरना से लेकर कामायनी तक छायावादी कविता है)। |
| 2. | सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” | अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, सरोज स्मृति (कविता), राम की शाक्ति पूजा (कविता) |
| 3. | सुमित्रानंदन पंत | उच्छ्वास, ग्रन्थि, वीणा, पल्लव, गुंजन (छायावादयुगीन); युगान्त, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, रजतशिखर, उत्तरा, वाणी, पतझर, स्वर्ण काव्य, लोकायतन |
| 4. | महादेवी वर्मा | नीहार, रश्मि, नीरजा व सांध्य गीत (सभी का संकलन ‘यामा” नाम से) |
| 5. | राम कुमार वर्मा | रूपराशि, निशीथ, चित्ररेखा, आकाशगंगा |
| 6. | उदय शंकर भट्ट | राका, मानसी, विसर्जन, युगदीप, अमृत और विष |
| 7. | वियोगी | निर्माल्य, एकतारा, कल्पना |
| 8. | लक्ष्मी नारायण मिश्र | अन्तर्जगत |
| 9. | जनार्दन प्रसाद झा “द्विज” | अनुभूति, अन्तर्ध्वनि |
राष्ट्रवादी सांस्कृतिक काव्य धारा के कवि और उनकी रचनाएँ
| क्रम | रचनाकार | राष्ट्रवादी सांस्कृतिक काव्य धारा की रचना |
|---|---|---|
| 1. | माखन लाल चतुर्वेदी | कैदी और कोकिला, हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिनी, पुष्प की अभिलाषा |
| 2. | सिया राम शरण गुप्त | मौर्य विजय, अनाथ, दूर्वादल, विषाद, आर्द्रा, पाथेय, मृण्मयी, बापू, दैनिकी |
| 3. | सुभद्रा कुमारी चौहान | त्रिधारा, मुकुल, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, वीरों का कैसा हो वसंत |
छायावाद युग (1918 ई०-1936 ई०)
‘छायावाद” के वास्तविक अर्थ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। छायावाद का अर्थ मुकुटधर पाण्डेय ने “रहस्यवाद”, सुशील कुमार ने ‘अस्पष्टता”, महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘अन्योक्ति पद्धति”, रामचन्द्र शुक्ल ने ‘शैली वैचित्र्य”, नंद दुलारे बाजपेयी ने ‘आध्यात्मिक छाया का भान”, डॉ० नगेन्द्र ने ‘स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह” बताया है।
नामवर सिंह के शब्दों में, ‘छायावाद शब्द का अर्थ चाहे जो हो परंतु व्यावहारिक दृष्टि से यह प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी की उन समस्त कविताओं का द्योतक है जो 1918 ई० से लेकर 1936 ई० (‘उच्छवास” से “युगान्त”) तक लिखी गई।
सामान्य तौर पर किसी कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र जाकर पड़े तो वह ‘छायावादी कविता” है। उदाहरण के तौर पर पंत की निम्न पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं जो कहा तो जा रहा है छाँह के बारे में लेकिन अर्थ निकल रहा है नारी स्वातंत्र्य संबंधी :
कहो कौन तुम दमयंती सी इस तरु के नीचे सोयी, अहा
तुम्हें भी त्याग गया क्या अलि नल-सा निष्ठुर कोई ।।
छायावाद युग की विशेषताएं:
- आत्माभिव्यक्ति अर्थात ‘मैं” शैली/उत्तम पुरुष शैली,
- आत्म-विस्तार/सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति
- प्रकृति प्रेम
- नारी प्रेम एवं उसकी मुक्ति का स्वर
- अज्ञात व असीम के प्रति जिज्ञासा (रहस्यवाद)
- सांस्कृतिक चेतना व सामाजिक चेतना/मानवतावाद
- स्वच्छंद कल्पना का नवोन्मेष
- विविध काव्य-रूपों का प्रयोग
- काव्य-भाषा–ललित-लवंगी कोमल कांत पदावली वाली भाषा
- मुक्त छंद का प्रयोग
- प्रकृति संबंधी बिम्बों की बहुलता
- भारतीय अलंकारों के साथ-साथ अंग्रेजी साहित्य के मानवीकरण व विशेषण विपर्यय अलंकारों का विपुल प्रयोग।
छायावाद युग में विविध काव्य रूपों का प्रयोग हुआ
- मुक्तक काव्य – सर्वाधिक लोकप्रिय
- गीति काव्य – “करुणालय (प्रसाद), ‘पंचवटी प्रसंग” (निराला), ‘शिल्पी” व “सौवर्ण रजत शिखर” (पंत)
- प्रबंध काव्य -‘कामायनी” व “प्रेम पथिक” (प्रसाद), ‘ग्रंथि’, ‘लोकायतन” व “सत्यकाम” (पंत), ‘तुलसीदास’ (निराला)
- लंबी कविता – (1)‘प्रलय की छाया” व “शेर सिंह का शस्त्र समर्पण” (प्रसाद);
- (2)‘सरोज स्मृति” व ‘राम की शक्ति पूजा’ (निराला); ‘परिवर्तन” (पंत)
