अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” – जीवन परिचय और कृतियां

खड़ी बोली हिन्दी के कवियों में अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” जी का प्रमुख स्थान है। वे द्विवेदी युग के प्रमुख कवि माने जाते हैं। हरिऔध जी को संस्कृत, ब्रजभाषा एवं खड़ी बोली पर समान अधिकार प्राप्त था। उन्होंने “प्रिय-प्रवास” नामक महाकाव्य की रचना खड़ी बोली में की तथा इसमें संस्कृत के वर्णवत्तों का प्रयोग छन्द विधान के रूप में किया। हिन्दी में आधुनिक काल में प्रथम महाकाव्य लिखने का श्रेय हरिऔध जी को ही दिया जाता है।

अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” का जीवन-परिचय

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी का जन्म सन् 1864 ई. में जिला आजमगढ़ के निजामाबाद कस्बे में हुआ था। इनके पिता का नाम पं. भोलासिंह उपाध्याय था। वर्नाक्यूलर मिडिल करके ये क्वीन्स कॉलेज बनारस में अंग्रेजी पढ़ने गए पर अस्वस्थता के कारण अध्ययन छोड़ना पड़ा। स्वाध्याय से इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। ये बीस वर्षों तक कानूनगो पद पर कार्यरत रहे और निजामाबाद के मिडिल स्कूल और काशी विश्वविद्यालय में इन्होंने अवैतनिक शिक्षक के रूप में काम किया। सन् 1645 ई. में इनका निधन हो गया।

कृतियाँ

  • काव्य ग्रन्थ– १. प्रियप्रवास, २. रसकलश, ३. चोखे चौपदे, ४. चभते चौपदे, ५. वैदेही वनवास।
  • नाटक– प्रद्युम्न विजय, रुक्मिणी परिणय।
  • उपन्यास– प्रेमकान्ता, ठेठ हिन्दी का ठाठ, अधखिला फूल।

हरिऔध जी द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि और गद्य लेखक हैं। देश-प्रेम, धर्म और संस्कति में आस्था, लोकमंगल की भावना इनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं। “प्रियप्रवास” खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। इसके लिखने पर इनको “मंगलाप्रसाद पारितोषिक” प्राप्त हुआ था। इसमें वर्णित कष्ण-चरित्र का आधार श्रीमदभागवत पुराण है। श्री त्रिलोचन पाण्डेय ने लिखा है :

“यह महाकाव्य अनेक रसों का आवास, विश्व-प्रेम, शिक्षा का विकास, ज्ञान-वैराग्य, भक्ति और प्रेम का प्रकाश एवं भारतीय वीरता, गम्भीरता परित स्वधर्मोद्धारक का पथ-प्रदर्शक काव्यामृतोच्छ्वास है।”

इनका दूसरा प्रमुख काव्य ग्रन्थ “वैदेही बनवास” है जिसमें राम के राज्याभिषेक के बाद सीता के वनवास, की करुण कथा का वर्णन है। इसमें राम और सीता को लौकिक प्राणियों के रूप में ही चित्रित किया है। “पारिजात” स्फुट गीतों का संकलन है और “चुभते चौपदे“, “चोखे चौपदे” और “बोलचाल” में भी स्फुट गीत हैं। “रस कलश” में ब्रजभाषा के छन्दों का संकलन है। “अधखिला फूल“, “ठेठ हिन्दी का ठाठ” इनके द्वारा रचित उपन्यास है और “प्रद्युम्न विजय” तथा “रुक्मिणी परिणय” नाटक है।

हिन्दी साहित्य में स्थान

खड़ी बोली के महाकवियों में हरिऔध जी का विशिष्ट स्थान है। खड़ी बोली से काव्य भाषा के रूप में प्रयुक्त करके, नवीन छन्द विधान करके एवं राधा को लोकसेविका के रूप में प्रस्तुत करके उन्होंने हिन्दी कवियों में विशिष्ट स्थान बना लिया है।
सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने इनके सम्बन्ध में लिखा है-

“खड़ी बोली के उस काल के कवियों में पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय “हरिऔध” की काव्य-साधना विशेष महत्व की ठहरती है। सह्रदयता और कवित्व के विचार से भी ये अग्रगण्य हैं। इनके समस्त पद औरों की तुलना में अधिक मधुर हैं, जो इनकी कवित्त शक्ति के परिचायक है।”

Q. राधा के चरित्र में हरिऔध जी ने अनोखी सूझ-बूझ का परिचय दिया है। इस कथन की सार्थकता पर सोदाहरण प्रकाश डालिए। अथवा “प्रियप्रवास” के आधार पर राधा की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। अथवा “पवन दूतिका” के आधार पर राधा के वियोग वर्णन की विशेषताएं बताइए। अथवा  “पवन दूतिका” प्रसंग में हरिऔध जी ने राधा को जो नया रूप दिया है, उसका विश्लेषण कीजिए।

कृष्ण-भक्ति साहित्य में राधा का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हरिऔध जी से पूर्व सूरदास, नन्ददास, घनानन्द, आदि अनेक कवियों ने राधा को नायिका मानकर बहुत लिखा है। राधा, श्रीकृष्ण की परम शक्ति स्वरूप हैं।

हरिऔध जी ने अपने “प्रियप्रवास” में राधा को एक नया और मौलिक रूप प्रदान किया है। प्रियप्रवास की राधा भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की प्रतिनिधि के रूप में एक आदर्श नारी है। उसके पारम्परिक स्वरूप में कवि ने मौलिक परिवर्तन कर दिया है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का निरूपण अग्र शीर्षकों में किया जा सकता है:

आदर्श प्रेमिका

रीतिकालीन कवियों ने राधा को भोग विलास की कठपुतली माना है, परन्तु उपाध्याय जी की राधा विचारशील है। उसमें नवयुवतियों की मादक चंचलता के स्थान पर प्रौढ़ स्त्रियों में पाई जाने वाली गुरु गम्भीरता ही प्रमुख रूप से लक्षित होती है। इस प्रकार हरिऔध जी की राधा एक आदर्श प्रेमिका के रूप में दिखाई देती है।

मर्यादा पालन करने वाली

राधा वेद-विधि की सर्वश्रेष्ठ संरक्षिका व मर्यादा के महत्व को मानने वाली संभ्रान्त कुल की ललना है। वह विश्वहित में लीन प्रौढ़ा रमणी है। राधा को मर्यादा का आवश्यकता से अधिक ध्यान है। वह पवन से कृष्ण की मर्यादा व शिष्टता का उल्लेख करती हुई कहती है :

बैठे होंगे निकट जितने शान्त औ शिष्ट होंगे।
मर्यादा का सकल जन को ध्यान होगा बड़ा ही।।

समाज-सेविका

हरिऔध जी की राधा महान समाज-सेविका है। वह सदैव समाज की सेवा में रत रहती हैं। राधा को अपने से भी बढ़कर दीन-दुःखियों का ध्यान है। राधा का चरित्र बहुत उदार है। राधा का यह रूप सर्वथा नवीन और मौलिक है।

वे सेवा थीं सतत करती वृद्ध रोगीजनों की।
दीनोंहीनों निबल विधवा, आदि को मानती थीं।

कर्तव्यनिष्ठ

राधा के चरित्र में कर्तव्यनिष्ठता कूट-कूट कर भरी हुई है। उनके हृदय में प्रेमाग्नि लता रहती है, परन्त उन्हें कर्तव्य का निरन्तर ध्यान रहता है। राधा अपने जीवन को विश्व-सेवा में अर्पित, कर देना चाहती है:

आज्ञा भूलूँ प्रियतम की विश्व के काम आऊँ।
मेरा कौमार-व्रत भव में पूर्णता प्राप्त होवे।।

इस प्रकार राधा कृष्ण से अनन्य प्रेम होने पर भी कर्तव्य मार्ग से कभी विचलित नहीं होती।

नारी सुलभ गुणों से सम्पन्न

राधा के चरित्र में नारी सुलभ गुण पाए जाते हैं। राधा एक सामान्य भारतीय नारी है। राधा यद्यपि विचारशील नारी है, परन्तु कृष्ण के विछोह में वह अत्यधिक दुःखी है। भारतीय नारी पति के ऊपर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहती है। राधा यद्यपि विचारशील एवं धर्मवान नारी है, परन्तु प्रिय की याद आते ही विरह वेदना से व्यथित होकर वह स्वयं कहती है:

निर्लिप्ता हूँ, अधिकतर मैं नित्यशः संयता हूँ।
तो भी होती अति व्यथित हूँ, श्याम की याद आते।।

विरह व्यथित प्रेमिका

राधा कृष्ण की अनन्य प्रेमिका हैं, किन्तु इस समय विरह व्यथित है। कृष्ण के मथुरा चले जाने से उनका हृदय वेदना से दग्ध हो उठता है। सारा संसार सूना लगने लगता है, सभी दिशाएँ रुदन करती प्रतीत होती हैं। वे पवन को अपना दूत बनाकर उसे प्रिय के पास मथुरा भेजती है और उससे अनुरोध करती हैं :

मेरे प्यारे नव जलद से, कंज से नेत्र वाले।
जाके आए न मधुवन से औ न भेजा सन्देसा।
मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।
जा के मेरी सब दुख-कथा श्याम को तू सुना दे।

आदर्श भारतीय नारी

हरिऔध जी की राधा में एक आदर्श भारतीय रमणी के सभी गुण विद्यमान हैं। वे परोपकार को प्रधानता देती हैं। उनमें सेवा, परोपकार एवं कर्तव्यनिष्ठा के गुण विद्यमान हैं। वे परदुःखकातर भी हैं। उनका चरित्र भावी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है। पवन को सन्देश देते समय उनकी परदुःखकातरता इन शब्दों में व्यक्त होती है :

जाते जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे।
तो जा के सन्निकट उसकी क्लान्तियों को मिटाना
धीरे-धीरे परस करके गात उत्ताप खोना।
सद्गन्धों से श्रमित जन को हर्षितों सा बनाना।।

उक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हरिऔधजी ने राधा के परम्परागत स्वरूप एवं चरित्र में मौलिक परिवर्तन करते हुए सर्वथा नवीन रूप प्रदान किया है। राधा का यह परिवर्तित रूप युगीन आवश्यकता के अनुरूप है तथा पाठकों को अधिक प्रभावित भी करता है। उसकी वेदना मार्मिक एवं हृदय-स्पर्शी भी है तथा परम्परागत स्वरूप में किया गया परिवर्तन प्रभावशाली है। निश्चय ही राधा आधुनिक युग की लोक सेविका एवं भारत की अनुपम नारी रत्न कही जा सकती है।


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