वातावरण (Environment) – वातावरण का अर्थ और परिभाषा

Vatavaran

वातावरण का अर्थ

Meaning of Environment

वातावरण शब्द के स्थान पर आज पर्यावरण को प्रयुक्त किया जाने लगा है, यदि हम पर्यावरण शब्द की सन्धि के आधार पर व्याख्या करें तो वह परि + आवरण यानी चारों ओर से घेरने वाला या ढकने वाला होगा। अत: हम कह सकते हैं कि वातावरण वह वस्तु है जो व्यक्ति को चारों ओर से ढ़ककर प्रभाव उत्पन्न करती है।

वातावरण केवल आकर्षण पैदा नहीं करता, बल्कि व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और संवेगात्मक विकास को दिशा देता है। बालक के सर्वांगीण विकास (All-round development) के लिए एक समृद्ध और सकारात्मक वातावरण अनिवार्य है।

यदि व्यक्ति के व्यक्तित्व में आकर्षण उत्पन्न होता है तो उसे हम वातावरण नहीं करते हैं। इसीलिये बालक के विकास के लिये वातावरण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है।

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाशास्त्रियों द्वारा वातावरण का अध्ययन किया गया और उसे निम्न रूप में परिभाषित किया गया है-

वातावरण की परिभाषा

एनास्टासी (Anastasi) के अनुसार -“वातावरण वह प्रत्येक वस्तु है, जो व्यक्ति के जीन्स के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु को प्रभावित करती है।

The environment is everything that effects the individual except is Genes.

एनेस्टेसी का मानना है कि गर्भधारण के समय माता-पिता से जो आनुवंशिक गुण (Genes) बालक को मिलते हैं, उन्हें छोड़कर दुनिया की हर चीज—चाहे वह मां का गर्भ हो, समाज हो, हवा, पानी या संस्कृति हो—सब वातावरण का हिस्सा है।

वुडवर्थ एवं मार्किस (Woodworth and Marquis) के अनुसार- “वातावरण में वे सभी बाह्य तत्त्व आ जाते हैं, जिन्होंने व्यक्ति को अपना जीवन आरम्भ करने के समय से प्रभावित किया है।

Environment covers all the outside factors that have acted on the individual since he began life.

यहाँ ‘जीवन आरंभ करने के समय’ का तात्पर्य जन्म से नहीं, बल्कि गर्भाधान (Conception) के समय से है। जब बच्चा मां के गर्भ में आता है, तभी से बाह्य कारक (जैसे मां का स्वास्थ्य, पोषण और मानसिक स्थिति) उसे प्रभावित करने लगते हैं।

बोरिंग, लैंगफील्ड तथा वैल्ड (Boring.Langfield and Weld) के अनुसार- “एक व्यक्ति के वातावरण से तात्पर्य उन सभी उत्तेजनाओं के योग से है, जिनको वह जन्म से मृत्यु तक ग्रहण करता है।

A person”s environment consists of the sum total of the stimulation which he receives from his conception until his death.

यह परिभाषा वातावरण को एक ‘उत्तेजना’ या ‘उद्दीपक’ (Stimulus) के रूप में देखती है। मनुष्य अपने पांच इंद्रियों (आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) के माध्यम से दुनिया से जो भी अनुभव, सीख या प्रभाव प्राप्त करता है, वह सब वातावरण के अंतर्गत आता है। यह प्रक्रिया जीवनभर चलती है।

उपर्युक्त परिभाषाओं और विश्लेषण के आधार पर हम वातावरण को निम्नलिखित बिंदुओं में समेट सकते हैं:

  • व्यापक प्रभाव: वातावरण कोई एक अकेली चीज नहीं है, बल्कि यह भौतिक (प्रकृति, जलवायु), सामाजिक (परिवार, मित्र, समाज) और सांस्कृतिक (नियम, मूल्य, परंपराएं) शक्तियों का एक समग्र योग (Sum total) है।
  • विकास का आधार: यह व्यक्ति के भीतर छिपी हुई जन्मजात शक्तियों और क्षमताओं को बाहर निकालने (Manifestation) का माध्यम है।
  • निरंतरता: वातावरण का प्रभाव व्यक्ति पर केवल बचपन में नहीं, बल्कि मां के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु की आखिरी सांस तक लगातार पड़ता रहता है।

सरल शब्दों में, वंशानुक्रम यदि हमें ‘बीज’ देता है, तो वातावरण वह ‘मिट्टी, धूप और पानी’ है जिसके बिना उस बीज का एक विशाल और स्वस्थ वृक्ष बनना असंभव है।

बालक के विकास में वातावरण का योगदान

बालक के विकास में वातावरण (Environment) एक अत्यंत व्यापक और जटिल कारक है। यह केवल हमारे आस-पास की हवा या पेड़-पौधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वह हर बाह्य शक्ति, उद्दीपक (Stimulus) और परिस्थिति शामिल है जो बच्चे को जन्म (और गर्भाधान) से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करती है।

मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन की सुविधा के लिए वातावरण को मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण भागों में विभाजित किया है: भौतिक (Physical), सामाजिक (Social), और सांस्कृतिक (Cultural) वातावरण। आइए इनके प्रकारों और बालक के विकास पर पड़ने वाले प्रभावों को विस्तार से समझते हैं:

1. भौतिक या प्राकृतिक वातावरण (Physical or Natural Environment)

इसके अंतर्गत हमारे आस-पास की भौगोलिक स्थिति, जलवायु (Climate), तापमान, वनस्पति, जीव-जंतु, भोजन, हवा और पानी आदि आते हैं।

बालक के विकास पर प्रभाव:

  • शारीरिक बनावट और रंग-रूप: जलवायु का प्रभाव बच्चे के शारीरिक गठन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। उदाहरण के लिए, ठंडे प्रदेशों के बच्चों का रंग प्रायः साफ और कद लंबा होता है, जबकि अत्यधिक गर्म प्रदेशों के बच्चों का शारीरिक गठन और रंग वहां की जलवायु के अनुकूल ढल जाता है।
  • स्वास्थ्य और कार्यक्षमता: शुद्ध हवा, स्वच्छ पानी और संतुलित आहार (Nutritious Diet) बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाते हैं। इसके विपरीत, प्रदूषित या अत्यधिक विषम जलवायु वाले क्षेत्रों में बच्चों का शारीरिक विकास बाधित हो सकता है।
  • मानसिक स्फूर्ति: अनुकूल और शांत प्राकृतिक वातावरण (जैसे हरियाली या खुला स्थान) बच्चे के मस्तिष्क को शांत और ऊर्जावान रखता है, जिससे उसकी सीखने की क्षमता (Cognitive Development) बढ़ती है।

2. सामाजिक वातावरण (Social Environment)

मानव एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए सामाजिक वातावरण का प्रभाव बालक के मानसिक, संवेगात्मक (Emotional) और नैतिक विकास पर सबसे गहरा पड़ता है। सामाजिक वातावरण के तीन मुख्य स्तंभ हैं:

क) परिवार (Family)

यह बालक का प्राथमिक सामाजिक वातावरण है। बच्चा सबसे पहले अपनी मां, पिता और भाई-बहनों के संपर्क में आता है।

  • प्रभाव: यदि परिवार का माहौल प्रेमपूर्ण, सहयोगात्मक और तनावमुक्त है, तो बच्चे में आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना विकसित होती है। इसके विपरीत, घरेलू क्लेश या माता-पिता के झगड़े बच्चे को अंतर्मुखी (Introvert), आक्रामक या कुंठित बना सकते हैं।

ख) मित्र और सहपाठी (Peer Group)

जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह अपने हमउम्र साथियों के साथ समय बिताता है।

  • प्रभाव: दोस्तों के साथ रहकर बच्चा खेल-खेल में सहयोग, नेतृत्व (Leadership), त्याग, और प्रतिस्पर्धा (Competition) की भावना सीखता है। यदि संगति अच्छी हो तो सकारात्मक गुणों का विकास होता है, और बुरी संगति में बच्चा असामाजिक व्यवहार सीख सकता है।

ग) विद्यालय और शिक्षक (School and Teachers)

विद्यालय बच्चे के औपचारिक सामाजिक विकास का केंद्र है।

  • प्रभाव: शिक्षक का व्यवहार, स्कूल के नियम और वहां का अनुशासन बालक के चरित्र निर्माण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। शिक्षक की प्रेरणा से बच्चे में छिपी प्रतिभाएं बाहर आती हैं।

3. सांस्कृतिक वातावरण (Cultural Environment)

सांस्कृतिक वातावरण से तात्पर्य समाज के रीति-रिवाजों, परंपराओं, धर्म, कला, भाषा, नैतिक मूल्यों (Moral Values) और रहन-सहन के तौर-तरीकों से है। प्रत्येक समाज की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति होती है, जिसमें बालक अनजाने में ही ढल जाता है।

बालक के विकास पर प्रभाव:

  • व्यक्तित्व और दृष्टिकोण का निर्माण: बच्चा जिस संस्कृति में पलता है, उसके सोचने-समझने का नजरिया (Perspective) वैसा ही बन जाता है। धर्म और संस्कार बच्चे को सही और गलत में अंतर करना सिखाते हैं, जिससे उसका नैतिक विकास (Moral Development) होता है।
  • भाषा और संवाद शैली: बालक अपनी मातृभाषा और बात करने का लहजा अपने सांस्कृतिक परिवेश से ही सीखता है।
  • रूढ़िवादिता या आधुनिकता: यदि सांस्कृतिक वातावरण खुला और प्रगतिशील है, तो बालक तार्किक और आधुनिक सोच वाला बनता है। इसके विपरीत, अत्यधिक संकीर्ण या रूढ़िवादी सांस्कृतिक माहौल बच्चे की स्वतंत्र सोच को दबा सकता है।

एक नज़र में: वातावरण के प्रकार और उनका प्रभाव

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि वातावरण का कौन-सा प्रकार बालक के किस विकास आयाम (Domain of Development) को सबसे अधिक प्रभावित करता है:

वातावरण का प्रकार मुख्य घटक प्रभावित होने वाला प्रमुख विकास आयाम
भौतिक वातावरण जलवायु, भोजन, प्रदूषण, भौगोलिक स्थिति शारीरिक विकास, स्वास्थ्य, शारीरिक कार्यक्षमता
सामाजिक वातावरण परिवार, मित्र, शिक्षक, पड़ोसी संवेगात्मक (Emotional) विकास, भाषा, व्यवहार
सांस्कृतिक वातावरण धर्म, परंपराएं, नैतिक मूल्य, रहन-सहन चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व (Personality), जीवन मूल्य

निष्कर्ष:

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वॉटसन (Watson) का एक कथन वातावरण की शक्ति को बहुत सटीक रूप से दर्शाता है। उन्होंने कहा था— “तुम मुझे कोई भी शिशु दे दो, मैं उसे वातावरण के प्रभाव से डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या चोर कुछ भी बना सकता हूँ।” हालांकि विकास में वंशानुक्रम (Heredity) की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह वातावरण ही है जो बालक के भविष्य की दिशा और दशा तय करता है।

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