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अधिशोषण सिद्धान्त के आधार पर ठोस उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को समझाइए।

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अधिशोषण सिद्धान्त के आधार पर ठोस उत्प्रेरक की क्रियाशीलता

इस सिद्धान्त के अनुसार, ठोस उत्प्रेरक अभिकारकों को अपनी सतह पर अधिशोषित कर लेता है। जिससे इनका ठोस की सतह पर सान्द्रण बढ़ जाता है और द्रव्य-अनुपाती क्रिया के नियमानुसार अभिक्रिया का वेग बढ़ जाता है, परन्तु यह सिद्धान्त इस दृष्टि से अपूर्ण है, कि इससे गैस तथा द्रव उत्प्रेरकों के प्रभाव को नहीं समझाया जा सकता। अत: इसका आधुनिक रूप निम्न प्रकार है –
आधुनिक अधिशोषण सिद्धान्त – आधुनिक सिद्धान्त, माध्यमिक यौगिक सिद्धान्त तथा अधिशोषण सिद्धान्त का संयुक्त रूप है।
उदाहरणार्थ– जब वनस्पति तेलों में हाइड्रोजन गैस निकिल उत्प्रेरक की उपस्थिति में प्रवाहित की जाती है। तो तेलों को हाइड्रोजनीकरण होता है और वनस्पति घी बनता है। Ni उत्प्रेरक की क्रियाविधि को निम्न प्रकार समझाया जा सकता है –

  1. अभिकारक अणुओं (वनस्पति तेल, हाइड्रोजन) का सान्द्रण उत्प्रेरक की सतह पर बढ़ जाता है। जिसके कारण अभिक्रिया का वेग बढ़ता है।

  2. Ni उत्प्रेरक की सतह पर विद्यमान मुक्त संयोजकताएँ अभिकारक अणुओं (वनस्पति तेल, हाइड्रोजन) से अस्थायी संयोग कर संक्रियित संकर बना लेती हैं जिससे उनके आकार में तनाव आ जाता है।

  3. इस तनाव तथा संक्रियित संकर की अधिक ऊर्जा के कारण अभिकारक अणुओं (वनस्पति तेल, हाइड्रोजन) की क्रियाशीलता बढ़ जाती है और संक्रियित संकर शीघ्र ही अपघटित होकर उत्पाद देता

  4. इस प्रकार बने उत्पाद (वनस्पति घी) के अणु उत्प्रेरक की मुक्त संयोजकताओं को छोड़कर सतह से पृथक् हो जति हैं और अभिकारक के नये अणु फिर इसी क्रम को दोहराते हैं।

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